सज्जाद हुसैन एक प्रतिभाशाली संगीतकार लेकिन दुनियादारी से अंजान। तलत महमूद को ग़लत महमूद और किशोर कुमार को शोर कुमार कहने वाले परफ़ेक्शनिस्ट और बेहद ग़ुस्सैल।
सज्जाद हुसैन के पिता थे उनके गुरु
15 जून 1917 को मध्य प्रदेश के सीतामऊ में जन्मे सज्जाद हुसैन के पिता अमीर ख़ान बहुत अच्छा सितार बजाते थे। हाँलाकि पेशे से वो एक दर्ज़ी थे और जब उन्हें सीतामऊ स्टेट के राजा रामसिंह द्वितीय की पोशाक बनाने का काम मिला तो उन्हें दरबार में रहने का मौक़ा मिला वहाँ होने वाली महफिलों को देखने का मौक़ा मिला बस वहीं से सितार से ऐसा लगाव हुआ कि सितार न सिर्फ़ सीखा बल्कि उसमें महारत भी हासिल की।
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उनके पाँच बेटे और चार बेटियों यानी 9 संतानों में सज्जाद हुसैन सबसे छोटे थे वो अपने पिता के साथ महल में जाते थे और वहीं देख सुनकर वो भी सितार की तरफ़ खींचे चले गए। एक दिन जब वो महल से लौटे तो घर आकर सितार पर ठीक वही धुन बजाई जो सुनकर आए थे। उनके पिता ये देखकर हैरान रह गए कि कैसे इतने छोटे बच्चे ने बिना सीखे वो धुन हू-ब-हू बजा ली।
उनके पिता उनके हुनर को पहचान गए थे और फिर उन्होंने जो सीखा था, वही सज्जाद हुसैन को भी सिखाया। उसमें महारत हासिल करने के बाद उन्होंने दूसरे इंस्ट्रूमेंट्स में भी महारत हासिल की। लेकिन मेडोलिन के वो जादूगर थे और इतने एक्सपर्ट कि वो राग रागिनियों को भी मेडोलिन पर ख़ूबसूरती और ईज़ के साथ बजाते थे। कोलकाता के अखिल भारतीय शास्त्रीय संगीत सम्मेलन में उन्होंने बहुत से कठिन रागों को इतनी ख़ूबसूरती से मेडोलिन पर बजाया कि वहाँ बैठे बड़े-बड़े उस्ताद भी दंग रह गए।
मैंडोलिन में उस्ताद सज्जाद हुसैन लगभग सभी वाद्य यंत्र बजा लिया करते थे
बहुत से इंस्ट्रूमेंट्स बजाने के बावजूद सज्जाद हुसैन के पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा संगीत को रोज़ी-रोटी का ज़रिया बनाए। इसीलिए सज्जाद हुसैन ने कभी इस विषय में नहीं सोचा लेकिन पिता की मौत के बाद जब हालात ख़राब होने लगे तो दो साल बाद वो अपने बड़े भाई निसार हुसैन के साथ वो फ़िल्मों में क़िस्मत आज़माने मुंबई चले आए। सितार, मैंडोलिन, वीणा, विचित्र वीणा, वायलिन, बांसुरी, जल तरंग, क्लैरिनेट, पियानो, हारमोनियम, स्पेनिश गिटार और हवाईयन गिटार, सज्जाद हुसैन को इतने इंस्ट्रूमेंट बजाने आते थे कि वो अपने आप में ऑर्केस्ट्रा थे, तो काम मिलना मुश्किल नहीं था।

सबसे पहले उन्हें 30 रूपए महीने की तनख़्वाह पर मिनर्वा मूवीटोन में काम मिला। इसके बाद उन्होंने वाडिया मूवीटोन में 60 रुपए महीने की तख़्वाह पर नौकरी की। लेकिन जल्दी ही उन्होंने वाडिया छोड़ दिया और ऑल इंडिया रेडियो ज्वाइन कर लिया। लेकिन वो नौकरी भी उन्होंने सिर्फ़ चार महीने बाद ही छोड़ दी। इसके बाद सज्जाद हुसैन मीर साहब, रफ़ीक़ ग़ज़नवी के सहायक रहे। फिर शौकत हुसैन रिज़वी के लिए बतौर कॉन्ट्रैक्ट प्लेयर काम किया और मीना कुमारी के पिता अली बक्श के सहायक भी रहे।
फिर उनकी मुलाक़ात हुई संगीतकार हनुमान प्रसाद से, वो सज्जाद हुसैन से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपना सहायक बना लिया। 1944 की फ़िल्म “गाली” में हनुमान प्रसाद के साथ उन्होंने भी संगीत दिया था। कहा जाता है कि जब शौकत हुसैन रिज़वी फ़िल्म “दोस्त’ बना रहे थे तो उसमें संगीत देने के लिए पहले मीना कुमारी के पिता अली बक्श को लिया गया था लेकिन उनकी बनाई धुनें फिल्म के निर्देशक शौकत हुसैन को पसंद नहीं आ रही थीं। उस वक़्त तक सज्जाद हुसैन सहायक का काम करना बंद कर चुके थे क्योंकि वो ख़ुद संगीतकार बनना चाहते थे मगर कोई मौक़ा नहीं मिल पा रहा था।
सज्जाद हुसैन एक के बाद एक विवादों में घिरते रहे
जब ये मौक़ा उनके सामने आया तो वो अली बक्श के साथ शौकत हुसैन से मिलने पहुँचे, उन्हें धुन सुनाई गई लेकिन कोई रिएक्शन नहीं आया पर नूरजहां ने भी ये धुन सुनी और उन्हें वो धुन बहुत पसंद आई। इस तरह 1944 की दोस्त बतौर स्वतंत्र और सोलो संगीतकार सज्जाद हुसैन की पहली फ़िल्म बन गई। लेकिन उनके नाम के साथ विवाद भी यहीं से जुड़ने लगे। “दोस्त” फिल्म में गाने गाये थे नूरजहाँ ने जिनसे शौकत हुसैन रिज़वी ने शादी की। जब गानों को लोकप्रियता मिली तो शौकत हुसैन रिज़वी ने सारा श्रेय गायिका नूरजहाँ को दे दिया।
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इस बात का सज्जाद हुसैन को बहुत बुरा लगा, कुछ उनका स्वभाव भी ग़ुस्से वाला था, बस उन्होंने ये तय कर लिया कि वो फिर कभी नूरजहाँ से गाना नहीं गवाएंगे। उस दौर में नूरजहाँ का बहुत नाम था, हर कोई उन्हें फ़िल्म में लेने की तमन्ना रखता था। ऐसे में “जुगनू” जैसी कुछ अच्छी फ़िल्में सज्जाद हुसैन के हाथ से निकल गईं। 40s में सज्जाद हुसैन ने धर्म (45), तिलस्मी दुनिया(46), 1857(46) क़सम(47) मेरे भगवान(47), और रूपलेखा(49) जैसी कुछ फ़िल्मों में म्यूजिक दिया मगर ज़्यादातर कामयाब नहीं रहीं तो उनमें सज्जाद हुसैन का संगीत भी अनसुना ही रह गया।
फिर 1950 में आई फ़िल्म “खेल”, ये फ़िल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इसी फ़िल्म में पहली बार लता मंगेशकर ने सज्जाद हुसैन के लिए गाने गाये थे। इसके कुछ गाने तकनीक और स्टाइल के हिसाब से बहुत अलग थे और मुश्किल भी। सज्जाद हुसैन लता मंगेशकर के पसंदीदा संगीतकार थे। और वो भी लता मंगेशकर की गायकी से बहुत प्रभावित थे, हाँलाकि दोनों ने बहुत कम काम साथ में किया।

मगर लता मंगेशकर ख़ुद मानती थीं कि सज्जाद हुसैन को ख़ुश करना आसान नहीं था, लेकिन इसी वजह से उन्होंने सज्जाद हुसैन से गायन की कई बारीक़ियाँ सीखीं। एक बार का क़िस्सा है जब रिहर्सल हो रही थी और लता मंगेशकर उस तरह नहीं गा पा रही थीं जैसा सज्जाद हुसैन चाहते थे कहते हैं तब उन्होंने डाँटते हुए कहा – लता जी ठीक से गाइए, ये नौशाद मियाँ का गाना नहीं है”
सज्जाद हुसैन ओरिजिनल संगीतकार थे लेकिन उनमें व्यवहारिकता की कमी थी
दरअस्ल सज्जाद हुसैन जितने प्रतिभाशाली थे, अपनी उस प्रतिभा पर उतना ही उन्हें गुरूर भी था। वो अपने और ग़ुलाम हैदर के सिवा किसी और को संगीतकार मानते ही नहीं थे। लेकिन लता मंगेशकर की क़ाबिलियत की बहुत क़द्र करते थे उनकी नज़रों में लता और नूरजहाँ ये दो ही बेहतरीन गायिकाएं थी। सज्जाद हुसैन एक तो परफ़ेक्शनिस्ट थे दूसरा उनका व्यवहार उनकी कामयाबी में बहुत बड़ी अड़चन था। यही वजह थी कि उन्हें कम काम मिला।
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1951 में के आसिफ़ की फ़िल्म “हलचल” आई जिसमें दो संगीतकार थे सज्जाद हुसैन और मोहम्मद शफ़ी। इस फ़िल्म में लता मंगेशकर के गाये गाने “आज मेरे नसीब ने मुझको रुला-रुला दिया” को सज्जाद हुसैन ख़ुद अपना बेस्ट गीत मानते थे। इसी साल आई “सैंया” में भी उनके संगीत की बहुत तारीफ़ हुई मगर उनकी तब तक की सबसे मशहूर फिल्म रही “संगदिल”।
तलत महमूद के गाये गीत “ये हवा ये रात ये चाँदनी तेरी एक नज़र पे निसार है” को लोग आज भी गुनगुनाते हैं तो उस समय इसकी लोकप्रियता का आलम ही अलग रहा होगा। इस गाने के 17 टेक्स लेने के बावजूद सज्जाद हुसैन इसके इंटरल्यूड के एक हिस्से से ख़ुश नहीं थे। इस फ़िल्म का सिर्फ़ यही गाना नहीं बल्कि दूसरे गाने भी मशहूर हुए मगर मगर इतना प्यारा म्यूजिक देने के बावजूद, फ़िल्म की कामयाबी के बावजूद सज्जाद हुसैन को तीन साल तक कोई काम नहीं मिला। कितना दुखद है, मगर सच है, कड़वा सच!

कहते हैं कि इस फ़िल्म के दौरान संगीतकार सज्जाद हुसैन और फ़िल्म के हीरो दिलीप कुमार के बीच कोई ग़लतफ़हमी हो गई थी, दिलीप कुमार उस समय की मशहूर तिकड़ी की एक कड़ी थे तो ज़ाहिर है कोई फ़िल्ममेकर उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहता था। उस पर सज्जाद हुसैन का ग़ुस्सा जिससे सभी वाक़िफ़ थे, नतीजा ये निकला कि उन्हें दिलीप कुमार के लिए तो फिर कभी भी म्यूजिक देने का मौक़ा दिया ही नहीं गया बल्कि अगले तीन साल तक उन्हें किसी भी फ़िल्म में काम करने का मौक़ा नहीं मिला।
सुपरहिट फिल्म देने के बावजूद आख़िरी वक़्त में मेंडोलिन बजाकर गुज़ारा किया
1955 में “रुख़साना” फ़िल्म के बाद सालों तक उनकी कोई हिंदी फ़िल्म नहीं आई। 1959 में एक श्रीलंकन फ़िल्म में उनका म्यूज़िक सुनाई दिया। पुणे के प्रसाद स्टूडियो में उस फ़िल्म की शूटिंग हुई थी, फिल्म का नाम था “दैवा योग्य” और ये श्री लंका में सुपरहिट रही। लेकिन तब भी उनकी अगली हिंदी फ़िल्म आने में सालों लग गए, लेकिन जब 1963 में वो फ़िल्म आई तो उसका संगीत इतना लाजवाब और यादगार बना कि आज भी सज्जाद हुसैन का नाम लेते ही सबसे पहले उसी फ़िल्म का नाम याद आता है “रुस्तम सोहराब’।
“रुस्तम सोहराब” के “ये कैसी अजब दास्ताँ हो गई है”, “फिर तुम्हारी याद आई ऐ सनम” और “मोज़न्दराँ” जैसे गाने आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। ये जहाँ अभिनेत्री के रूप में सुरैया की आख़िरी फ़िल्म थी, वहीं संगीतकार के रूप में सज्जाद हुसैन की आख़िरी मशहूर फ़िल्म थी। इतना उम्दा और हिट म्यूज़िक देने के बाद भी फ़िल्ममेकर्स का ध्यान उनकी तरफ़ नहीं गया। इसके बाद 1973 की “मेरा शिकार” और 1977 की “आख़िरी सजदा” में उन्होंने संगीत दिया।
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बतौर संगीतकार सज्जाद हुसैन को फ़िल्में नहीं मिल रही थीं मगर मेडोलिन बजाने के प्रस्ताव उन्हें लगातार मिलते रहे। 1959 में आई फ़िल्म “दो बहनें” के टाइटल ट्रैक में उन्होंने मेंडोलिन बजाया। 1975 में आई तेलुगु फ़िल्म “मुथ्याला मुग्गु” में उनकी कंपोज़ की गई मेडोलिन कम्पोज़ीशन का इस्तेमाल किया गया। अपने आख़िरी दिनों में सज्जाद हुसैन ने साधारण ज़िन्दगी जी वो कंसर्ट्स में मेडोलिन पर हिंदुस्तानी संगीत परफॉर्म किया करते थे।

सज्जाद हुसैन के पाँचों बेटे भी संगीत से जुड़े रहे और अलग-अलग म्यूजिक डायरेक्टर के साथ काम करते रहे। 21 जुलाई 1995 को सज्जाद हुसैन इस दुनिया से रुख़सत हो गए। अपने पूरे फ़िल्मी सफ़र में उन्होंने 20 से भी कम फिल्में कीं। मगर वो कितने प्रतिभाशाली थे इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि वो ऐसे संगीतकार थे जिनका कोई सहायक नहीं था। वो धुन से लेकर ऑर्केस्ट्रा तक हर पहलू पर ख़ुद ही काम किया करते थे। अपनी हर रचना को तब तक ख़ुद संवारते रहते थे जब तक वो एक शाहकार न बन जाए।

संगीतकार अनिल बिस्वास के अनुसार सज्जाद हुसैन अकेले ऐसे संगीतकार थे जिन्हें मौलिक संगीतकार का ख़िताब दिया जा सकता है। नूरजहाँ ने भी उनकी मौत पर कहा था की ऐसे लोग रोज़-रोज़ पैदा नहीं होते। मगर मौत के वक़्त उनके जनाज़े के साथ इंडस्ट्री से सिर्फ़ दो लोग मौजूद थे संगीतकार ख़ैयाम और ग़ज़ल गायक पंकज उधास। यही है फ़िल्म इंडस्ट्री की सच्चाई, ये जब किसी को ऊँचा उठाती है तो उसे सर आँखों पे बिठा लेती है और जब किसी को भुलाती है तो ऐसे जैसे उस हस्ती का कभी कोई वजूद रहा ही नहीं हो।