एन दत्ता

एन दत्ता के संगीत ने बहुत सी फ़िल्मों में जान डाली, सब वो गाने गुनगुनाते हैं पर शायद ही कोई उन गीतों के संगीतकार का नाम जानता हो।

एन दत्ता ने दिए बेहद कर्णप्रिय गीत

वक़्त बहुत बड़ी चीज़ है अच्छा हो तो इंसान को सातवें आसमान पर बिठा देता है बुरा हो तो बड़े-बड़ों को मिटटी में मिला देता है। फिल्म इंडस्ट्री में तो ऐसे बहुत से लोगों के उदाहरण हैं जो शोहरत की बुलंदी पर पहुँचे, दौलत में खेले मगर उनकी ज़िंदगी का आख़िरी दौर मुफ़लिसी और गुमनामी में गुज़रा। ऐसे ही संगीतकार थे दत्ताराम बाबूराव नाइक जिन्हें आमतौर पर एन दत्ता के नाम से जाना जाता है। उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत दिए, फिर भी भुला दिए गए।

  • मेरी तस्वीर लेकर क्या करोगे तुम – काला समंदर
  • सारे जहाँ से अच्छा – भाई-बहन
  • संभल ऐ दिल – साधना
  • धड़कने लगी दिल के तारों की दुनिया – धूल का फूल
  • मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी – चंद्रकांता
  • मैं तुम्हीं से पूछती हूँ – ब्लैक कैट
  • प्यार का जहाँ हो – जालसाज़
  • पौंछ कर अश्क अपनी आँखों – नया ज़माना

एन दत्ता संगीत से प्रेम के कारण 12 साल की उम्र में घर से भाग गए थे

एन दत्ता का जन्म 12 दिसंबर 1927 को मुंबई में हुआ था, वो क़रीब एक साल के थे जब वो अपनी माँ के साथ अपने मामा के पास चले गए। उनका बचपन वहीं गुज़रा क्योंकि उनके पिता की मौत उनके बचपन में ही हो गई थी। गाँव में एक मंदिर था, जब भी मंदिर में लोग इकठ्ठा होकर भजन गाते तो एन दत्ता को उन्हें सुनकर बहुत आनंद आता वो भी उनके साथ गाते और जब भी मौक़ा मिलता वो हारमोनियम भी बजाते।

एन दत्ता

उस समय घुमन्तु थिएटर हुआ करते थे, उनके गाँव में भी अक्सर मराठी थिएटर ग्रुप आया करते थे, जो अक्सर संगीतमय हुआ करते थे। ऐसे माहौल में उनके अंदर संगीत सीखने की इच्छा जागी लेकिन जब उन्होंने अपने मामा के सामने अपनी ख़्वाहिश ज़ाहिर की तो मां ने बहुत डाँटा और उन्हें पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा। लेकिन संगीत का बीज तो उनके अंदर पड़ चुका था, और कुछ वो उम्र भी ऐसी थी कि बस ज़िद में आकर सिर्फ़ 12 साल की उम्र में वो घर-बार, पढ़ाई छोड़ कर मुंबई चले आए।

एन दत्ता के टैलेंट को पहचाना एक और गुणी संगीतकार ने

मुंबई में एन दत्ता के शुरूआती संघर्ष के बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती सिवाय इसके कि वो प्रभात फेरी और गली मोहल्लों में होने वाले संगीत कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। वहीं संगीतकार S D बर्मन ने उन्हें गाते हुए सुना और जब पता चला कि उस गाने की धुन भी उस लड़के ने बनाई है तो वो बहुत प्रभावित हुए, और उन्होंने एन दत्ता को अपना सहायक बना लिया। S D बर्मन के साथ काम करते हुए एन दत्ता की पहचान साहिर लुधियानवी जैसे गीतकार से हुई जिनके साथ उनका एक लम्बा एसोसिएशन रहा।

जब एन दत्ता सहायक के तौर पर काम कर रहे थे तभी उन्हें स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर फ़िल्में मिलने लगी थीं। उन्हें पहला ब्रेक मिला 1951 में आई पंजाबी फ़िल्म “बालो” में। मगर उनकी पहली हिंदी फ़िल्म रही 1955 में आई “मिलाप”। ये फ़िल्म राज खोसला की थी जो एक समय में गुरुदत्त के सहायक थे। जब बाज़ी फ़िल्म बन रही थी तभी राज खोसला अपनी डायरेक्टोरियल डेब्यू की तैयारी कर रहे थे। शूट के दौरान उनकी मुलाक़ात एन दत्ता से हुई और तय हो गया कि उनकी फ़िल्म में म्यूज़िक एन दत्ता देंगे।

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इस तरह 1955 में आई “मिलाप” स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर एन दत्ता की पहली हिंदी फ़िल्म बनी। 1955 में ही सिप्पी फ़िल्म्स की फ़िल्म “मरीन ड्राइव” में भी एन दत्ता का संगीत सुनाई दिया। और फिर G P सिप्पी ने उन्हें अपनी अगली फ़िल्म “चंद्रकांता” के संगीत की ज़िम्मेदारी भी सौंप दी और इस फ़िल्म के साथ भी एन दत्ता ने पूरा पूरा इन्साफ किया। बाद में भी उन्होंने सिप्पी फ़िल्म्स की कई फ़िल्मों में म्यूजिक दिया।

एन दत्ता

जब फ़िल्म MR. X फ़िल्म आई तो उसके कई गाने बहुत लोकप्रिय हुए और उस फ़िल्म ने एन दत्ता के लिए कामयाबी के दरवाज़े खोल दिए। कहते हैं बी आर चोपड़ा ने MR X के संगीत से प्रभावित होकर ही उन्हें अपनी फ़िल्मों में संगीतकार के रूप में चुना। ये उस समय की बात है जब “नया दौर” का संगीत हिट हो चुका था, मगर रॉयल्टी को लेकर O P नैय्यर और B R चोपड़ा के बीच कुछ मतभेद हो गए थे। इसी वजह से B R चोपड़ा किसी नए संगीतकार की तलाश में थे और उनकी तलाश पूरी हुई एन दत्ता पर जाकर।

वैसे कहा ये भी जाता है कि एन दत्ता के नाम की सिफारिश साहिर लुधियानवी ने की थी जो उस समय टॉप पर थे। चोपड़ा कैंप से जुड़ने की वजह कोई भी हो पर जब ये तीनों मिले तो इस संगम ने कमाल की फ़िल्म दी “साधना”, जिसकी सफलता ने एन दत्ता को अव्वल नंबर के संगीतकारों के साथ खड़ा कर दिया।

साहिर और एन दत्ता जब जब साथ आए कमाल के गीत बने

बतौर संगीतकार एन दत्ता की पहली फ़िल्म थी राज खोसला के निर्देशन में बनी “मिलाप(55)”। एस डी बर्मन के साथ काम करते हुए एन दत्ता साहिर लुधियानवी की शायरी से बहुत मुतास्सिर हुए थे, इसीलिए अपनी पहली फ़िल्म में उन्होंने साहिर लुधियानवी से ही गीत लिखवाए। और फिर इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी ने कितनी ही फिल्मों में बेहतरीन गीत दिए।

एन दत्ता

साहिर के अलावा भी जब कभी एन दत्ता को अच्छे शायरों का साथ मिला उनकी धुनों ने कमाल किया। फिर चाहे जाँनिसार अख्तर हों या मजरूह सुल्तानपुरी। “साधना” की सफलता के बाद एन दत्ता सिप्पी फ़िल्म्स के साथ-साथ चोपड़ा फ़िल्म्स के भी प्रतिष्ठित संगीतकार बन चुके थे। ये एन दत्ता का पीक टाइम था, हर निर्माता-निर्देशक उन्हें अपनी फ़िल्म में लेना चाहता था।

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भाई-बहन, ब्लैक कैट, धूल का फूल, धर्मपुत्र, दीदी, नाचघर, जालसाज़, मि जॉन और 1961 की दो भाई जैसी फ़िल्मों में उनका संगीत सुनाई दिया, जिसे लोगों ने बेहद पसंद किया। वो उनकी ज़िंदगी का सबसे व्यस्त समय था। यहाँ बी आर फ़िल्म्स की दो फ़िल्मों का ज़िक्र करना ज़रूरी है, “धूल का फूल” और “धर्मपुत्र”।

एन दत्ता

“धूल का फूल” एन दत्ता की सबसे मशहूर फिल्म कही जा सकती है, इस का विषय बहुत गंभीर था, उसके बावजूद एन दत्ता ने सिचुएशन के मुताबिक ऐसी धुनें बनाईं कि हर एक गीत लाजवाब बना। बी आर फिल्म्स की “धर्मपुत्र” कामयाब नहीं हुई, मगर इसका म्यूजिक बहुत सक्सेसफुल रहा। इसमें आशा भोसले की गाई लाजवाब सदाबहार नज़्म “मैं जब भी अकेली होती हूँ” तो जैसे अमर हो गई।

साहिर की शायरी और एन दत्ता का संगीत जब-जब साथ आए उन्होंने कमाल ही किया। दोनों में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि साहिर लुधियानवी का नाम आज भी लोगों की ज़बान पर है और एन दत्ता का नाम पर वक़्त की गर्द के नीचे दब गया है।

करियर की ऊँचाई पर पहुँच कर एन दत्ता वहाँ टिक नहीं पाए

धर्मपुत्र के बाद से ही एन दत्ता का करियर ढलान की तरफ़ जाने लगा। उसकी बड़ी वजह रही उनकी सेहत। बी आर चोपड़ा ने अपनी अगली फ़िल्म के लिए उन्हें ही साइन किया था मगर एन दत्ता को अचानक हार्ट अटैक आया। और उन्हें ये डर बैठ गया कि वो शायद अब कभी ठीक नहीं होंगे। उन्हें इस बीमारी और डर से उबरने में वक़्त लगा और उसी दौरान बी आर फ़िल्म्स में संगीतकार रवि की एंट्री हुई और सब जानते हैं कि गुमराह के बाद रवि ही बी आर फ़िल्म्स के परमानेंट संगीतकार बन गए थे। सिप्पी फ़िल्म्स में भी ओ पी नैयर का आगमन हो गया था।

बीमारी से तो एन दत्ता ठीक ठाक निकल आए मगर करियर में वो जिस पोजीशन पर थे वापस उस पर कमबैक नहीं कर पाए। धीरे-धीरे एन दत्ता के लिए बड़े बैनर्स की फ़िल्मों का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया। उस समय जो भी ऑफर्स उन्हें मिले वो स्वीकार करते चले गए। हाँलाकि उस तरह की फ़िल्मों में भी उनकी धुनें बहुत मधुर रहीं और गाने भी पॉपुलर हुए मगर उनका अच्छा दौर लौट कर नहीं आया।

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उस दौर में उन्होंने ग्यारह हज़ार लड़कियाँ(62), काला समंदर(62) रुस्तम-ए-बग़दाद(1963) चाँदी की दीवार(64) जैसी बहुत सी फिल्में कीं जिनमें  छोटे बजट की स्टंट और मराठी फ़िल्मों भी शामिल रहीं। उन फ़िल्मों की असफलता ने उनके करियर पर और भी बुरा असर डाला। मगर ऐसे ही दौर में एक फ़िल्म ताज़ा हवा के झोंके की तरह आई और वही उनकी आख़िरी उल्लेखनीय फ़िल्म रही, वो थी 1970 में आई नया रास्ता।

एन दत्ता को चोरी छुपे ऑर्केस्ट्रा में काम करना पड़ा

“नया रास्ता” की कामयाबी एन दत्ता के करियर को कोई फायदा नहीं पहुंचा सकी। फ़िल्म नगरी यूँ तो बहुत मतलब परस्त मानी जाती है मगर यहाँ बहुत से लोगों ने अच्छे दोस्त भी पाए। उन्हें कुछ अच्छे दोस्त मिले, ऐसे दोस्तों में हम साहिर लुधियानवी का नाम ले सकते हैं जिनकी मदद से एन दत्ता को उनकी आख़िरी फ़िल्म मिली “चेहरे पे चेहरा” उसके बाद वो गुमनाम होकर रह गए।

एन दत्ता

कहते हैं कि एक समय पर एन दत्ता को इतने बुरे दिन देखने पड़े कि वो चोरी-छुपे दूसरे संगीतकारों के ऑर्केस्ट्रा में वादक के रुप में शामिल होते थे। उनकी ये हालत देख कर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने उन्हें अपने ऑर्केस्ट्रा में रख लिया था। एन दत्ता मौजूद हों या नहीं रिकॉर्डिंग के बाद उनका मेहनताना उन तक पहुंचा दिया जाता था।

फ़िल्मों से नाता टूटने के बाद एन दत्ता कभी-कभी संगीतकार सी रामचंद्र और पटकथा लेखक मधुसूदन कालेलकर से मिल लिया करते थे। इन दोनों की मौत के बाद ये सिलसिला भी टूट गया। और वो पूरी तरह फ़िल्मी दुनिया से कटकर अकेले रह गए। उनकी सेहत भी लगातार गिर रही थी और फिर वो दिन आया जब वो इस गुमनाम ज़िन्दगी को छोड़ गए।

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30 दिसंबर 1987 को उन्होंने आख़िरी साँस ली। उनके निधन के बाद महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें सम्मानित किया और उनके घर के पास वाले रास्ते का नामकरण भी उनके नाम पर कर दिया। पर ये मान सम्मान पाने और देखने के लिए एन दत्ता तो नहीं रहे फिर क्या फ़ायदा ? कुछ चीज़ें तभी मायने रखती हैं जब वो इंसान के जीते-जी उसे मिल जाएँ, उसकी ज़िंदगी को बेहतर बना पाएँ। मौत के बाद किसी बात का क्या अर्थ ?