नाशाद

नाशाद वो संगीतकार जिनका अच्छा ख़ासा नाम था शौकत फ़िल्मों में भी उन्होंने कभी शौकत हैदरी और कभी शौकत देहलवी के नाम से संगीत दिया। मगर फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्हें अपना नाम बदलने की ज़रुरत महसूस हुई। जबकि वो अपने असली नाम से भी कई फ़िल्मों में अच्छे गीत दे चुके थे ? बड़ी ही प्रोफ़ेशनल कहानी थी उनके नाम बदलने के पीछे ? पर उसके बारे में जानने से पहले उनके बारे में कुछ और बातें जान लेते हैं। 

नाशाद ने कई नामों से फिल्मों में संगीत दिया

शौकत अली का जन्म 11 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ। अपनी स्कूली पढाई पूरी करने के साथ साथ उन्होंने बाँसुरी बजाना सीखा और क़रीब 40 के दशक में मुंबई जाकर बस गए। मुंबई में उन्होंने क़रीब 29 फ़िल्मों में संगीत दिया। मुंबई में बतौर संगीतकार उनकी पहली फिल्म आई 1947 में “दिलदार” जिसमें  उन्होंने शौकत देहलवी के नाम से संगीत दिया था। 1948 की “जीने दो”, “सुहागी”, “टूटे तारे” और “पायल” में उन्होंने शौकत अली के नाम से म्यूजिक दिया। इसके बाद वो शौकत अली हैदरी के नाम से संगीत देने लगे। 

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1949 की फ़िल्म “दादा” में उनके संगीतबद्ध कई गाने हिट हुए। फिर 1949 में ही आई फ़िल्म “आइए” जिसमें उन्होंने मुबारक बेगम को पहली बार प्लेबैक का मौक़ा दिया। इसके बाद 1951 की “ग़ज़ब”, 1953 की “चार चाँद” जैसी फिल्में आईं। मगर “दादा” से जो थोड़ी बहुत लोकप्रियता उन्हें मिली थी वो फिर नहीं मिली और न ही अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिले। 

ब्रांड नेम से कंफ्यूज़ करने के लिए बदला गया नाम

50 के ही दशक में उन्हें मिली लेखक-निर्माता-निर्देशक J नक्शब की फ़िल्म “नग़मा”, जिसमें हेरोइन थीं नादिरा। J नक्शब वही थे जिन्होंने महल फिल्म का मशहूर गीत “आएगा आने वाला” लिखा था। “नग़मा” फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही नक्शब ने अभिनेत्री नादिरा से शादी कर ली थी। J नक्शब की रेपुटेशन कोई बहुत अच्छी नहीं थी और उन्होंने कई ऐसे काम किए भी जिनमें से एक था शौकत हैदरी का नाम बदलना और इसके पीछे मंशा उनका भला करना नहीं था बल्कि दर्शकों को धोखा देकर अपना फ़ायदा करवाना था। 

जैसे यूट्यूब पर क्लिकबेट किया जाता है यानी ऐसे अट्रैक्टिव या सनसनी फैलाने वाले या controversial थंबनेल लगाना कि इंसान वीडियो पर क्लिक ज़रूर करे। फिर अंदर चाहे वैसा कुछ न हो। इसे आप ये भी कह सकते हैं कि किसी बड़े ब्रांड से मिलता जुलता नाम रख लिया जाए ताकि लोग नाम से कंफ्यूज होकर कोई प्रोडक्ट ख़रीद लें। ठीक यही किया J नक्शब ने। 

नाशाद 

हम सब जानते हैं कि 50 के दशक में सबसे मशहूर संगीतकार थे नौशाद। नक्शब ने पहले संगीतकार नौशाद से ही फ़िल्म में म्यूज़िक देने के लिए संपर्क किया था मगर नौशाद ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इस बात पर J नक्शब को बहुत ग़ुस्सा आया और उन्होंने उनके नाम को भुनाने के लिए उनसे मिलता जुलता नाम शौकत हैदरी के लिए चुना ताकि confusion में ही सही लोग उनकी फ़िल्म देखने के लिए सिनेमा हॉल तक जाएँ, उसके गाने सुने।  और इस तरह शौकत अली हैदरी बन गए नाशाद।

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J नक्शब ग़लत भी नहीं थे क्योंकि जब मैंने पहली बार नाशाद का नाम किसी कैसेट पर पढ़ा था तो मुझे लगा था कि ये ज़रूर कोई टाइपिंग एरर होगा क्योंकि जिन गानों पर उनका नाम था वो बहुत ही प्यारे और मशहूर थे। और उन्हीं गानों के लिए नाशाद आज भी जाने जाते हैं। पर उन गानों की बात करने से पहले “नग़मा” की बात पूरी कर लेते हैं। “नग़मा” में नाशाद का संगीत उनकी पिछली फ़िल्मों से काफ़ी बेहतर था और इस फ़िल्म के कई गाने बहुत मशहूर हुए। इनमें शमशाद बेगम का गाया गाना “बड़ी मुश्किल से दिल की बेक़रारी को क़रार आया” तो बेहद मशहूर हुआ।

वो फ़िल्म जिसने नाशाद का नाम अमर कर दिया

“नग़मा” का म्यूजिक काफ़ी पसंद किया गया फिर 1954 में आई “दरवाज़ा”। लेकिन जब 1955 में “बारादरी” आई तो उसका एक-एक गाना बहुत मशहूर हुआ और इस तरह कि आज भी नाशाद का नाम लेते ही फ़िल्म बारादरी का नाम याद आता है। मगर उस समय इसका फायदा नाशाद को नहीं मिला क्योंकि लोगों को यही लगा कि वो गाने नौशाद ने बनाए है और नाम छपने में कोई ग़लती हुई है। लेकिन गानों की मधुरता में कहीं कोई कमी नहीं थी आज भी ये गाने कानों में रस घोल देते हैं। 

नाशाद

1955 में नाशाद के संगीत से सजी फ़िल्म “जवाब” आई।  इसके भी कुछ गाने लोकप्रिय हुए मगर “बारादरी” वाली लोकप्रियता उन्हें फिर नहीं मिली। उन्होंने कुछ फ़िल्मों में दूसरे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत दिया। जैसे 1955 की फिल्म “सबसे बड़ा रुपैया” में संगीतकार OP नैयर के साथ, 1955 की “शहज़ादा” में S मोहिंदर के साथ नाशाद ने कुछ गीतों का संगीत दिया। 1956 की “जल्लाद” और 1957 की “बड़ा भाई” जैसी कुछ फ़िल्मों में उनके संगीत की चर्चा हुई मगर इसी बीच कुछ फ़िल्में फ़्लॉप हो जाने से उनके करियर पर बुरा असर पड़ा।

फिर 1958 में  J नक्शब के साथ उनकी एक और फिल्म आई “ज़िंदगी या तूफ़ान”। फिल्म “ज़िंदगी या तूफ़ान” का निर्देशन भी J नक्शब ने ही किया था। इसमें नूतन और प्रदीप कुमार ने अभिनय किया था। फ़िल्म बन कर तैयार थी पर इसी बीच नक़्शब ने पाकिस्तान जाने का इरादा कर लिया और जाते-जाते फ़िल्म भी अपने साथ ले गए। 1958 में ये फ़िल्म पाकिस्तान में रिलीज़ हुई और सुपरहिट रही। मगर ये कभी हिंदुस्तान में रिलीज़ नहीं हो पाई। इसके बाद नाशाद की कई फिल्में आई – 1959 में “ज़रा बच के”, 1960 में “क़ातिल”, 1961 में “प्यार की दास्ताँ”, 1962 में “रूपलेखा”। फिर 60 के दशक में वो पाकिस्तान चले गए, भारत में उनकी आख़िरी फ़िल्म रिलीज़ हुई 1965 में “फ्लाइंग मैन”। 

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जब नाशाद पाकिस्तान पहुंचे तो J नक्शब पहले ही वहाँ थे तो एक बार फिर दोनों की टीम बनी और नाशाद की पाकिस्तानी डेब्यू रही 1964 की “मयख़ाना”। फिर उन्होंने “आफशां”, “सालगिरह”, “फिर सुबह होगी”, “रिश्ता है प्यार का”, जैसी क़रीब 60 पाकिस्तानी फ़िल्मों में संगीत दिया और कुछ फ़िल्मों के गीत बहुत ही मशहूर हुए। पाकिस्तान में उनकी गिनती बड़े संगीतकारों में की जाती रही। 

उनके 8 बेटे और सात बेटियाँ हुईं उनके लगभग सभी बेटे उनके नक़्शेक़दम पर चले और उन सब ने अपने पिता का फ़िल्मी नाम ही बतौर सरनेम अपनाया “नाशाद” । 14 जनवरी 1981 को लाहौर में उनका निधन हो गया। आज की पीढ़ी शायद नाशाद के बारे में ज़्यादा न जानती हो मगर बारादरी के गानों की मेलोडी जब जब फ़ज़ाओं में गूँजेगी नाशाद का नाम भी लिया जाएगा।

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