जॉनी वॉकरजॉनी वॉकर

जॉनी वॉकर नाम से पीने वालों को व्हिस्की की याद आती है और फ़िल्मी दीवानों को मशहूर कॉमेडियन की। मैं हास्य कलाकार की ही बात कर रही हूँ जिनका असली नाम था बदरुद्दीन क़ाज़ी लेकिन फ़िल्मों में आते ही एक घटना घटी और वो बन गए जॉनी वॉकर और ये नाम वाक़ई व्हिस्की से ही प्रेरित है। 

बदरुद्दीन क़ाज़ी ने अपने 15 सदस्यों के परिवार की रोज़ी-रोटी चलाने के लिए न जाने कौन-कौन से काम नहीं किए। आइसक्रीम बेची, फल-सब्ज़ियाँ बेचीं, और आख़िरकार बस में कंडक्टर की नौकरी करने लगे, फिर यही नौकरी उनके फ़िल्मों में आने की वजह बनी। 

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बदरुद्दीन जमालुद्दीन क़ाज़ी बस में टिकट काटते हुए भी लोगों को हँसाते रहते थे। एक दिन उस बस में कहीं से बलराज साहनी चढ़े और बदरुद्दीन के इस हुनर पर उनकी पारखी नज़र पड़ी। उन दिनों वो गुरुदत्त की फ़िल्म “बाज़ी” की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे। उन्होंने बदरुद्दीन के हुनर की तारीफ़ की और उनसे कहा कि गुरुदत्त से जाकर मिल लें। बलराज साहनी की सलाह पर गुरुदत्त से मिलने पहूँचे तो जाते ही शराबी की एक्टिंग शुरु कर दी। 

वो उस रोल में इतने रियल लग रहे थे कि गुरुदत्त को लगा कि सचमुच कोई शराबी घुस आया है और वो उन्हें वहां से निकलने ही वाले थे कि बलराज साहनी वहाँ पहुँच गए और तब बदरुद्दीन अपने असल रूप में वापस लौटे। उनकी एक्टिंग से गुरुदत्त इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने न सिर्फ़ अपनी फ़िल्म में उन्हें एक रोल दिया बल्कि अपनी फेवरेट व्हिस्की के नाम पर उनका फ़िल्मी नामकरण कर दिया – जॉनी वॉकर।

जॉनी वॉकर
जॉनी वॉकर

एक बूँद शराब न पीने वाले का नाम जॉनी वॉकर 

जॉनी वॉकर का जन्म 11 नवंबर 1926 को इंदौर में हुआ था और उनके पिता वहाँ एक मिल में काम करते थे। जब मिल बंद हो गई तो बेहतर भविष्य की तलाश में पूरा परिवार मुंबई आ गया। जॉनी वॉकर फ़िल्मी दुनिया के सपने देखते हुए ही बड़े हुए थे, वो फ़िल्में देख-देख कर उनकी हू-ब-हू नक़्ल किया करते थे जैसे वो कैमरा के सामने खड़े हों। एक बार वो तैरते हुए नक़्ल कर रहे थे कि डूबते-डूबते बचे लेकिन एक्टिंग का जूनून कम नहीं हुआ।  

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इसी तरह उन्होंने शराबी का अभिनय करना भी शुरु किया था और इतना डूब कर करते थे कि एक बार उनके पिता ने उन्हें सचमुच का शराबी समझ कर घर में उनकी एंट्री बंद कर दी थी। जबकि सच ये था कि जॉनी वॉकर ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी शराब को हाथ नहीं लगाया था। जॉनी वॉकर के लिए उनका परिवार ही उनकी दुनिया थी और दुनिया उनका परिवार। 

जॉनी वॉकर ने हिंदी सिनेमा में राज खोसला, बी आर चोपड़ा जैसे इंडस्ट्री के तमाम बड़े फिल्मकारों के साथ काम किया। लेकिन सबसे अच्छा तालमेल बना गुरुदत्त के साथ – एक वक़्त तो ऐसा आया कि गुरुदत्त सिचुएशन समझते थे और सब उन पर छोड़ देते थे कहते थे – “जॉनी अब तू ये सीन कर लेना” दोनों की आपसी समझ इतनी बढ़िया थी की गुरुदत्त के कहे बग़ैर वो समझ जाते थे कि उन्हें क्या चाहिए।

जॉनी वॉकर
गुरुदत्त और जॉनी वॉकर

जॉनी वॉकर गानों को एक अलग ही टच दे देते थे 

फ़िल्म “प्यासा” की शूटिंग की बात है वो लोग कोलकाता में थे और सड़क किनारे बने ढाबे में नाश्ता कर रहे थे। वहीं पास में एक मालिशवाला बड़े ही अनूठे अंदाज़ में किसी के सिर की मालिश कर रहा था। गुरुदत्त ने जॉनी वॉकर से कहा कि उसे ज़हन में बिठा लें। और बाद उसी अंदाज़ को जॉनी वॉकर ने अपने तरीक़े से फ़िल्म के उस  मशहूर गाने में उतारा जो एक तरह से उनका ट्रेड मार्क बन गया – “सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए…..”

जॉनी वॉकर
जॉनी वॉकर

गुरुदत्त के साथ बाज़ी से जो साथ शुरु हुआ तो उनकी हर फ़िल्म में जॉनी वॉकर का एक महत्वपूर्ण रोल होता था।उन दोनों ने क़रीब 10 साल काम किया जिसमें CID, Mr. and Mrs. 55, प्यासा, चौदहवीं का चाँद, काग़ज़ के फूल, जैसी उत्कृष्ट फिल्में शामिल हैं और लगभग हर फ़िल्म में उनके ऊपर एक गाना भी फ़िल्माया गया। वो ऐसे कॉमेडियन थे जिनके लिए ख़ासतौर पर गाने बनाये जाते थे। 

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उनके कुछ मशहूर गाने – 

  • ए दिल है मुश्किल जीना यहाँ – CID 
  • जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी – Mr. and Mrs. 55
  • सुनो सुनो मिस चेटर्जी – बहारें फिर भी आएँगी 
  • अरे ना ना ना तौबा तौबा – आर-पार 
  • मैं बम्बई का बाबू – नया दौर 
  • हम भी अगर बच्चे होते – दूर की आवाज़ 
  • जंगल में मोर नाचा किसी ने न देखा – मधुमती 
  • मेरा यार बना है दूल्हा – चौदहवीं का चाँद 
  • ऑल लाइन क्लियर – चोरी चोरी 
  • कल तलक हम ठीक था – डिटेक्टिव 
  • ग़रीब जान के हमको न यूँ – छूमंतर 

फ़िल्मों में टॉप पर थे जॉनी वॉकर 

जॉनी वॉकर का मानना था कि ऊपर वाले ने उन्हें दुनिया को हँसाने के लिए ही भेजा है। शायद इसीलिए जब वो छूमंतर, माईबाप जैसी कुछेक फ़िल्मों में बतौर हीरो नज़र आये तो वहां भी उन्होंने सबको खुलकर हँसाया। एक फ़िल्म तो उनके नाम पर ही बनाई गई – जॉनी वॉकर। मुस्लिम सामाजिक फ़िल्मों में हास्य-अभिनेता के रूप में वो पहली पसंद हुआ करते थे। वहीं सामाजिक विषयों पर बनी फ़िल्मों में भी उनकी भूमिकाएँ काफ़ी पसंद कि गईं। 2-3 दृश्यों वाली छोटी सी भूमिका में भी वो अपनी गहरी छाप छोड़ जाते थे।

जॉनी वॉकर
आनंद के एक दृश्य में राजेश खन्ना और जॉनी वॉकर

याद कीजिए ऋषिकेश मुखर्जी की “आनंद” जिसमें वो मुरारीलाल नाम के एक गुजराती स्टेज डायरेक्टर के किरदार में थे। फिल्म के अंत में मुरारीलाल भी कहीं न कहीं दिल में बसा रह जाता है। अपने करियर में उन्होंने CID, जाल, टैक्सी-ड्राइवर, आर-पार, मिस कोका कोला, नया अंदाज़, गेटवे ऑफ़ इंडिया, चौदहवीं का चाँद, चोरी चोरी,  एक साल, घर-संसार, अमरदीप, 12 O’Clock, पैग़ाम, मेरे महबूब, शहनाई, दिल दिया दर्द लिया, सूरज, बहु बेगम, पालकी, मेरे हुज़ूर, आदमी और इंसान, गोपी, आनंद जैसी बहुत सी फ़िल्मों में यादगार रोल किए।  

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वो हिंदी सिनेमा के शुरूआती दौर में हास्य-कलाकारों में अव्वल नंबर पर थे। उनका हास्य बहुत साफ़-सुथरा था, जिसमें दोहरे अर्थ वाले संवाद नहीं थे, कोई अश्लीलता नहीं थी। संवाद बोलने का एक अलग अंदाज़, टेढ़ी टोपी, ढीली शेरवानी और अनूठी सी हँसी। गुरुदत्त तो उनके अभिनय तो effortless मानते थे। वाक़ई आप उनकी कोई भी फ़िल्म उठा के देख लें कभी भी न तो ओवर-एक्टिंग होती थी न ही ऐसा लगता था कि हम किसी फ़िल्म स्टार को देख रहे हैं बस वो किरदार नज़र आता था। 

अवॉर्ड

मधुमती फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के पुरस्कार से नवाज़ा गया और शिकार फिल्म के लिए उन्हें दिया गया – सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार का पुरस्कार।  70 का दशक आते-आते हिंदी फ़िल्मों में हास्य का परिदृश्य बदलने लगा था। उस समय तक क़रीब 300 से ज़्यादा फ़िल्में करने के बाद, अपने करियर की ऊँचाई पर रहते हुए जॉनी वॉकर ने फ़िल्मों से सन्यास ले लिया। उनका कहना था – “मैं शिखर पर पहुंच गया हूँ। माउंट एवरेस्ट चढ़ चुका, उतरना भी है ना,  घर है, कार है, बच्चे है, टेलीफोन है… और क्या चाहिए” 

जॉनी वॉकर ने कभी फिल्मों में वापसी के बारे में नहीं सोचा था उन्हें नए दौर की फ़िल्में और उनका अंदाज़ पसंद नहीं था। मगर कमल हासन और गुलज़ार साहब के आग्रह पर वो “चाची 420” में एक मेकअप मैन की भूमिका निभाने पर राज़ी हो गए और फिर वही उनकी आख़िरी फ़िल्म रही। 80 के दशक में उन्होंने एक फ़िल्म का निर्माण करने की कोशिश भी की मगर वो फ़िल्म बन नहीं पाई और फिर उन्होंने ये विचार ही त्याग दिया। 

जॉनी वॉकर एक साधारण इंसान 

अभिनेत्री शकीला की छोटी बहन नूर बनी जॉनी वॉकर की शरीक़े हयात। उस समय वो भी फ़िल्मों में काम करती थीं और फ़िल्म आर-पार के सेट पर दोनों की मुलाक़ात हुई। ये मुलाक़ात पहले प्यार और फिर शादी में बदल गई। शादी के बाद नूर ने फिल्में छोड़ दीं और अपनी घर-गृहस्थी में बिजी हो गईं। जॉनी वॉकर छह बच्चों के पिता बने तीन बेटे – नाज़िम, काज़िम और नासिर और तीन बेटियाँ कौसर, फ़िरदौस और तसनीम। उनका बेटे नासिर भी फ़िल्मों और टीवी की दुनिया का एक जाना माना नाम हैं।

जॉनी वॉकर

हाँलाकि जॉनी वॉकर अपने बच्चों को हमेशा फ़िल्मी पार्टीज़ से फ़िल्मी माहौल से दूर रखते थे। ख़ुद भी एक सिम्पल लाइफ जीते थे। उन्हें पेड़-पौधों में बहुत रूचि थी, अपने घर में लगे जामुन, ज़ैतून,अमरुद, पपीते के पेड़ों का वो बहुत ध्यान रखते थे। इसके अलावा उनकी बचपन से ही खेलों में भी बहुत रूचि रही। तैराकी, स्केटिंग, हॉकी, बैडमिंटन, बिलियर्ड्स, केरम सभी उन्हें पसंद थे। स्लो साइकिलिंग में तो उन्होंने अवॉर्ड भी जीता था। 

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उन्हें मछली पकड़ने का इंस्ट्रूमेंट और टोपी इकट्ठा करना बहुत पसंद था , बाद में उन्होंने उन्हें अपनी फिल्मों में भी इस्तेमाल किया। उन्होंने कई लाइसेंसी बंदूकें भी जमा कीं थीं, वह नौशाद साहब के साथ शिकार करने जाया करते थे। उनके पास कई कारें थीं जिनमें उनकी पसंदीदा थी “मर्सिडीज कैपरी” थी। वो इतनी अच्छी थी कि एक बार राजेश खन्ना ने कहा था कि ‘अगर आप इसे कभी बेचना चाहैं, तो मुझे दे दें ‘।

शांत और हंसमुख स्वभाव के जॉनी वॉकर अपने वक़्त में इतने मशहूर थे कि बांद्रा के क्रॉस रोड पर जिस नूर विला में वो रहते थे, उसके पास के बस-स्टॉप का नाम ही “जॉनी वॉकर बस-स्टॉप” हो गया था। 29 जुलाई 2003 को जॉनी वॉकर इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। लेकिन फिल्मों का यही तो कमाल है कि कलाकार पास न होते हुए भी पास होता है, इस दुनिया में न रहकर भी यहीं रहता है। हम सब के दिलों में, ज़हन में।   

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