रमेश देव एक ऐसे कलाकार थे जो हर तरह की भूमिकाओं में उतर जाते थे, नकारात्मक भूमिकाओं में बेहद बुरे और सकारात्मक रोल्स में बेहद अच्छे। मराठी फ़िल्मों के स्टार हिंदी फ़िल्मों के मशहूर चरित्र कलाकार बने और अपनी गहरी छाप छोड़ी।
रमेश देव “द स्टार”
2013 में आई “जॉली LLB” में जिस कलाकार ने कौल साब का किरदार निभाया था वो थे रमेश देव। हिंदी फ़िल्मों में कभी विलेन, कभी सपोर्टिंग रोल्स में नज़र आने वाले रमेश देव मराठी सिनेमा के नामी हीरो भी थे और ख़तरनाक़ विलेन भी। उनकी फिल्मों की पब्लिसिटी में कुछ ऐसा लिखा जाता था कि “गेस करिए कि इस फ़िल्म में रमेश देव हीरो हैं या विलेन” वो मराठी के ऐसे सुपरस्टार थे।

राजेश खन्ना “द सुपरस्टार” जब संघर्ष कर रहे थे तो रमेश देव को देखने के लिए गिरगांव के ईरानी होटल के पास घंटों खड़े रहते थे। हिंदी और मराठी के दो सुपरस्टार आनंद फ़िल्म में एक साथ परदे पर दिखे। रमेश देव की ख़ूबी यही थी कि उन्होंने कभी ख़ुद पर स्टारडम हावी नहीं होने दिया। इसीलिए मराठी फ़िल्मों में इतना नाम कमाने के बाद भी उन्होंने हिंदी सिनेमा में छोटी-बड़ी हर तरह की भूमिकाएं कीं। और हिंदी फ़िल्मों में उनके आने की वजह भी बहुत इंटरेस्टिंग थी।
आख़िर मराठी के सुपरस्टार को हिंदी सिनेमा में आने की ज़रुरत क्यों हुई
मराठी फिल्मों में पूरी तरह नाम कमाने और क़दम ज़माने के साथ ही रमेश देव थिएटर भी किया करते थे। उन्होंने अपनी एक ड्रामा कंपनी भी शुरु की थी जिसमें वो अभिनय के साथ-साथ अपने नाटक तैयार किया करते थे, और जगह-जगह जाकर शोज किया करते थे। यानी मराठी सिनेमा और थिएटर में उनका एक मक़ाम था, इज़्ज़त थी।
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एक बार एक शो के सिलसिले में रमेश देव और उस समय के कुछ नामी-गिरामी स्टेज आर्टिस्ट कोल्हापुर से थोड़ा आगे एक छोटी सी जगह पर जा रहे थे, लेकिन रास्ते में गाड़ी पंक्चर हो गई। वो जिस जगह टायर ठीक करा रहे थे वहीं पास में एक चाय का खोखा था तो वो लोग वहाँ चाय पीने चले गए। लेकिन चाय वाले ने कांच के साफ़ ग्लास होते हुए भी उन लोगों को बहुत ही गंदे से अल्युमिनियम ग्लास में चाय दी। ये बात कुछ लोगों को बहुत बुरी लगी।

उन्होंने पूछा कि कांच के ग्लास में चाय क्यों नहीं दी ? तो उस लड़के ने कहा कि ये ग्लास VVIP लोगों के लिए हैं। तो उन लोगों ने कहा कि हम सब मराठी फ़िल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े स्टार्स हैं और रमेश देव तो उस समय मराठी फ़िल्मों के टॉप हीरो थे। उस लड़के ने उन सब को देखा और दीवार पर चिपकाई हुई राज कपूर, दिलीप कुमार और वैजन्तीमाला की तस्वीरों की तरफ़ इशारा करके बोला कि वो हैं हीरो। ये उन सब मराठी के स्टार के लिए एक शॉक लगने जैसा था। लेकिन इस घटना के बाद रमेश देव ने फैसला कर लिया कि वो हिंदी फ़िल्मों में काम करेंगे।
अपनी पहली हिंदी फ़िल्म के लिए रमेश देव ने ख़ुद कोशिश की
रमेश देव ने हिंदी फ़िल्मों के ऑफर आने का इंतज़ार नहीं किया, बल्कि तुरंत अपने फ़ैसले पर काम करना शुरू कर दिया । आज के टाइम में ये सोचकर शायद हैरानी हो लेकिन इतने बड़े स्टार होते हुए उन्होंने अपने “कुछ होने” के ईगो को साइड पर रखकर ख़ुद जाकर ताराचंद बड़जात्या से बात की जो उस समय अपनी पहली फ़िल्म बना रहे थे-“आरती”, उस फ़िल्म में रमेश देव को हीरो प्रदीप कुमार के भाई का रोल मिल गया। जिसकी पत्नी बहुत ही “क्लेशी” थी, उनका रोल छोटा था मगर हिंदी फ़िल्मों में शुरुआत हो गई थी।

“आरती” के बाद रमेश देव दिखाई दिए शशि कपूर स्टारर फ़िल्म “मोहब्बत इसको कहते हैं” में। उधर मराठी फ़िल्मों में वो अभी भी पीक पर थे, इधर हिंदी फ़िल्मों में भी धीरे-धीरे पहचान बनने के साथ-साथ अच्छे रोल्स मिलने लगे थे। और उन्होंने यहाँ भी कोई सीमा रेखा नहीं खींची- दस लाख, मेहरबान, शिकार, सरस्वतीचंद्र, खिलौना जैसी फिल्मों में उन्होंने नेगेटिव पॉजिटिव हर तरह के रोल्स किए।
इंजीनियर परिवार के रमेश देव एक लड़की की वजह से फ़िल्मों में आए
रमेश देव मूल रुप से राजस्थान के हैं, उनके दादा-परदादा इंजीनियर थे। उनके दादाजी छत्रपति साहू महाराज के बुलावे पर बतौर चीफ़ इंजीनियर कोल्हापुर आये थे और फिर वहीं बस गए। उनके पिता कोल्हापुर में जज थे, वहीं 1929 में 30 जनवरी को रमेश देव का जन्म हुआ। रमेश देव अपने कॉलेज में सेक्रेटरी थे और बाक़ी युवा लड़के लड़कियों की तरह कॉलेज लाइफ का मज़ा ले रहे थे। कॉलेज लाइफ में अक्सर लड़के लड़कियों को इम्प्रेस करते हैं तो वो भी एक लड़की को इम्प्रेस करने में लगे थे।
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मराठी फ़िल्ममेकर दिनकर पाटिल उनके फ़ैमिली फ्रेंड थे, तो उन्होंने सोचा क्यों न लड़की को फ़िल्म की शूटिंग दिखाई जाए। लेकिन वो वक़्त और था अकेली लड़की को ले जाते तो बातें बनती इसलिए वो 10-15 लड़के-लड़कियों के ग्रुप को शूटिंग दिखाने ले गए। उस दिन इत्तफ़ाक़ से कॉलेज का ही सीन शूट हो रहा था जिसमें उस पूरे ग्रुप को शामिल कर लिया गया। रमेश देव को स्टेज होस्ट का किरदार मिला, उनके लिए ये बहुत आसान रहा और पूरा सीन बिना रिटेक के शूट हो गया। उस सीन के लिए उन्हें 25 रुपए, और उनके साथ गई लड़कियों को 10-10 रुपए और लड़कों को 8 रुपए मिले।

इसी के साथ रमेश देव को बतौर जूनियर आर्टिस्ट एनरोल कर लिया गया। इस तरह किस्मत से वो फ़िल्मी दुनिया का हिस्सा बन गए। 1970 की फ़िल्म “जीवन मृत्यु” में उन्होंने एक भ्रष्ट और लालची वक़ील रोल किया था। फिल्म के इस सीन में बहुत से इमोशंस एक साथ लाने थे, पहले हँसना, फिर रोना, लगभग पागल होने की एक्टिंग करनी थी और फिर काफी दूर तक भाग कर जाना था। कुछ रेहर्सल्स के बाद उन्होंने ये मुश्किल सीन सिर्फ़ एक टेक में पूरा किया। इससे निर्माता इतने खुश हुए कि उन्हें 5000 रुपए ज़्यादा दिए, ज़ाहिर है एक टेक में शॉट होने से न सिर्फ़ टाइम बचा बल्कि स्टूडियो और इक्विपमेंट्स का ख़र्च भी बचा।
हिंदी फ़िल्मों में ये पति-पत्नी की जोड़ी बहुत मशहूर रही
जीवन-मृत्यु के बाद रमेश देव के पास हिंदी फ़िल्मों की लाइन लग गई। लेकिन जिस फ़िल्म ने उन्हें सबसे ज़्यादा मशहूर किया वो थी “आनंद”, इसमें उन्होंने अपनी पत्नी सीमा देव के साथ काम किया था। रमेश देव अक्सर फ़िल्मों में अपनी रियल लाइफ पार्टनर सीमा देव के साथ नज़र आते थे। इन दोनों ने क़रीब 75 हिंदी और मराठी फ़िल्मों में पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका की भूमिकाएँ की थीं। फ़िल्मों की तरह ही इनकी प्रेम कहानी भी फ़िल्मी थी।

रमेश देव मुंबई की एक लोकल ट्रेन से गोरेगाँव जा रहे थे, दिन का समय था और ट्रेन लगभग ख़ाली थी। जब वो ट्रैन में चढ़े तो उन्हें मोगरे की ख़ुशबू आई और वो उसी दिशा में चलते चले गए। वहां सीमा जी अपनी किसी रिश्तेदार के साथ बैठी थीं। हाँलाकि उन दोनों ने रमेशजी को पहचान लिया था, मगर वो फ़िल्मों में एक विलेन के तौर पर पहचाने जाते थे, इसीलिए सीमा और उनके साथ बैठी महिला ने उनसे बात नहीं की। लेकिन संयोग ऐसा हुआ कि सीमा जी भी वहीं जा पहुँची जहाँ रमेश जी को जाना था।
बाद के दिनों में उन दोनों का परिचय कराया गया, और फिर ये परिचय धीरे-धीरे प्रेम में बदला और फिर प्रेम शादी में। रमेश देव अपने व्यवहार, PUNCTUALITY, SINCERITY और अपनी क़ाबिलियत के कारण हमेशा फ़िल्मकारों के पसंदीदा रहे। दस लाख, सरस्वती चंद्र, खिलौना, मेरे अपने, ज़मीर, आख़िरी दाव, ड्रीम गर्ल, दादा, हथकड़ी, अशांति, ख़ुद्दार, क़ुदरत का क़ानून, मि. इंडिया, प्रतिबन्ध, घायल, घायल वन्स अगेन, और अपनी आख़िरी हिंदी फ़िल्म फोटोग्राफ़ में रमेश देव ने अपने अभिनय के अलग-अलग रंग बिखेरे। लेकिन उनका सबसे यादगार और दर्शकों का पसंदीदा रोल है फ़िल्म आनंद के डॉ का।

उनके दो बेटे हैं अजिंक्य देव जो मशहूर मराठी अभिनेता हैं और अभिनय देव जिन्होंने देली-बेली जैसी फ़िल्म का निर्देशन किया था। रमेश देव ने 285 से ज़्यादा हिंदी और 190 से ज़्यादा मराठी फ़िल्मों में अभिनय किया। 30 मराठी ड्रामा के अलावा उन्होंने कई फीचर फ़िल्मों और टीवी धारावाहिकों का निर्माण किया, कई फ़िल्मों डॉक्युमेंट्रीज़ और टीवी सीरियल्स का निर्देशन किया। और क़रीब 250 एड फ़िल्म्स बनाई।

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कई स्टेट और नेशनल अवार्ड्स से सम्मानित रमेश देव को 2013 में फ़िल्मों में उनके योगदान को देखते हुए पुणे इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाज़ा गया। 2022 में 2 फ़रवरी को रमेश देव इन दुनिया को छोड़ कर चले गए। पर आज भी जब-जब हम उनकी परफॉरमेंस देखते हैं तो यूँ लगता है कि वो अभिनय नहीं कर रहे बल्कि जी रहे हैं। एक बेहतरीन अभिनेता के साथ-साथ पति-पत्नी की मशहूर फ़िल्मी जोड़ी के रूप में भी उन्हें हमेशा याद किया जायेगा।
