शशिकलाशशिकला

शशिकला की पहचान परदे पर एक स्वार्थी, बुरी औरत यानी खलनायिका की थी। हाँलाकि उन्होंने बहुत से पॉजिटिव यादगार रोल किये मगर आज भी लोग उन्हें बतौर खलनायिका याद करते हैं।

कुछ कलाकार अपनी एक ऐसी जगह बनाते हैं कि फिर उस जगह पर आप किसी और की कल्पना ही नहीं कर सकते। जैसे इंडस्ट्री में एक ही हेलन हैं, एक ही ललिता पवार थीं और एक ही शशिकला। शशिकला की ख़ासियत थी कि ग्लैमरस रोल्स में वो बहुत सिडक्टिव लगती थीं और जब वो खलनायिका बन कर परदे पर आती तो उनकी पर्सनेलिटी बहुत ही अलग होती।

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ललिता पवार जहाँ एक कठोर सास के तौर पर याद की जाती हैं। वहीं शशिकला का नाम आते ही पीठ पीछे माँ को भड़काने वाली ननद की छवि उभरती है जो बेहद चालाक झगड़ालू और भोलेपन की एक्टिंग करके किसी अपने का ही फ़ायदा उठाने में माहिर है। उनके ऐसे किरदार इतने वास्तविक थे कि उस दौर में अगर कोई ऐसी लड़की दिख जाती थी तो उसे शशिकला नाम दे दिया जाता था। हाँलाकि शशिकला ने बहुत से ग्लैमरस और पॉजिटिव किरदार भी निभाए, मगर ये छवि ऐसे उनसे चिपकी कि फिर वही उनकी असल पहचान बन गई।

शशिकला

शशिकला का बचपन

शशिकला जवलकर का जन्म महाराष्ट्र के शोलापुर में हुआ। उनके पिता अनंतराव जावलकर एक कपड़ा व्यापारी थे जिनकी सोलापुर में एक दुकान थी। उनके पिता ने अपना लगभग सारा पैसा अपने छोटे भाई को शिक्षा के लिए लंदन भेजने में खर्च कर दिया। अपने भाई की शिक्षा के लिए उन्होंने अपने परिवार को भी इग्नोर किया लेकिन इसी बीच उन्हें कारोबार में घाटा उठाना पड़ा, उस वक़्त वो भाई किसी काम नहीं आया और वो लोग लगभग सड़क पर आ गए।

6 भाई बहनों में शशिकला सबसे ज़्यादा प्रतिभाशाली और खूबसूरत थी,और एक अच्छी अभिनेत्री के सभी गुण भी उनमें बचपन से ही मौजूद थे। पाँच साल की उम्र से ही उन्होंने नृत्य करना, गाना और मंच पर अभिनय करना शुरू कर दिया था। उन दिनों शशिकला कई सामाजिक उत्सवों में भाग लिया करती थीं तो उस आर्थिक संकट की घड़ी में लोगों की सलाह पर उनका परिवार मुंबई आ गया ताकि उन्हें फिल्मों में काम मिल सके और परिवार का गुज़र-बसर हो सके।

शशिकला

 

शशिकला को शुरुआत में न हिंदी आती थी न उर्दू

जिस वक़्त शशिकला मुंबई पहुँची उनकी उम्र सिर्फ़ 11 साल थी ऐसे में हेरोइन की भूमिका मिलना मुश्किल था और वो बिलकुल बच्ची भी नहीं थीं तो बाल कलाकार के तौर पर भी काम नहीं मिल रहा था। इसके अलावा ज़बान भी एक समस्या थी, उस वक़्त उर्दू तो दूर की बात है उन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी। इसी वजह से ‘ज़ीनत’ फ़िल्म में नूरजहाँ की बेटी की भूमिका उनके हाथ से निकल गई। लेकिन इसी फ़िल्म की मशहूर क़व्वाली में उन्हें शामिल कर लिया गया।

‘ज़ीनत’ के निर्माता निर्देशक थे नूरजहां के शौहर शौक़त हुसैन रिज़वी। क़व्वाली में उनके परफॉर्मेंस से वो इतने ख़ुश हुए कि उन्हें २० रूपए इनाम में दिए और फिर शौक़त साहब ने उनसे तीन साल का कॉन्ट्रैक्ट किया जिसमें पहली शर्त उर्दू सीखने की थी। बाद में तो शशिकला ने उर्दू के साथ साथ हिंदी गुजराती इंग्लिश सबमें महारत हासिल की। ज़ीनत फिल्म 1945 में रिलीज़ हुई थी और 1947 में देश का विभाजन हो गया जिसके बाद शौक़त रिज़वी पाकिस्तान चले गए।

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ऐसे में एक बार फिर शशिकला को संघर्ष का सामना करना पड़ा। शशिकला ने डोली, पगड़ी, गर्ल्स स्कूल जैसी कुछ फिल्मों में छोटी छोटी भूमिकाएं करने के बाद 1949 में  रणजीत मूवीटोन की फ़िल्म “नज़ारे” में पहली बार हेरोइन की भूमिका की। इसके बाद “जलतरंग, राजरानी, आरज़ू, अजीब लड़की, तीन बत्ती चार रास्ता, जीवन ज्योति, चाचा चौधरी और शर्त जैसी कई फिल्में आईं जिनमें उन्होंने इंडस्ट्री के बड़े फिल्मकारों के साथ काम किया।

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क़रीब 19 साल की उम्र में उन्होंने एक व्यवसायी ओ पी सहगल से शादी कर ली। शादी के बाद उनके पति ने एक फ़िल्म बनानी शुरू की, जिसका नाम था – ‘करोड़पति’, पर फ़िल्म बनने में 6 साल लग गए और इस अरसे में वो लोग पूरी तरह क़र्ज़ में डूब गए। नतीजा ये हुआ कि उस क़र्ज़ से छुटकारा पाने के लिए शशिकला को हर तरह की फ़िल्मों में काम करना पड़ा। और जैसे भी रोल्स मिले उन्होंने स्वीकार किये, ये उनके लिए काफ़ी मुश्क़िल दौर था।

सालों के संघर्ष के बाद आई वो फ़िल्म जिसने शशिकला को स्टार बना दिया

कई बार इंसान संघर्ष करते-करते थक जाता है, लेकिन वो ही पीक टाइम होता है जब हार नहीं माननी चाहिए। शशिकला इतने सालों से इंडस्ट्री में थीं मगर बतौर हेरोइन स्टैब्लिश नहीं हो पाईं थीं तो उन का फ्रसट्रेशन इतना बढ़ गया था कि उन्होंने फ़िल्में छोड़ने का इरादा कर लिया था। उन्हीं दिनों उन्हें ताराचंद बड़जात्या का बुलावा आया। वो अपनी पहली फ़िल्म का निर्माण करने जा रहे थे और इसमें उनका नेगेटिव किरदार था। शशिकला ने सोचा कि इस फ़िल्म के बाद वो इंडस्ट्री को पूरी तरह गुड बाय बोल देंगी पर फिल्म के निर्देशक फणि मजूमदार ने उनसे कहा कि इस फिल्म के बाद उन्हें इतना काम मिलेगा कि फुर्सत ही नहीं मिलेगी और वैसा ही हुआ भी।

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राजश्री पिक्चर्स की फिल्म आरती रिलीज़ हुई तो जसवंती के उस नेगेटिव किरदार ने उन्हें घर घर में पहचान दिलाई, साथ ही फिल्फेयर अवार्ड, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट अवार्ड के साथ साथ कई और पुरस्कार उनकी झोली में आए। आरती के बाद शशिकला स्टार बन गईं थी। 18 साल लम्बे संघर्ष का फल उन्हें मिला।  60 के दशक में हरियाली और रास्ता, हिमालय की गोद में, हमराही, फूल और पत्थर, गुमराह, दादी माँ, नीलकमल, छोटी सी मुलाक़ात, पैसा और प्यार जैसी कई फिल्मों में उन्होंने असरदार भूमिकाएँ की।

अध्यात्म की तरफ़ झुकाव

इतनी व्यस्तता के बाद उन्होंने थोड़ा आराम करने की सोची और कुछ समय फिल्मों से दूर रहीं लेकिन जो एक बार इस ग्लैमर वर्ल्ड से जुड़ गया वो न तो खुद इससे ज़्यादा समय तक दूर रह पाता है न ही ये दुनिया उसे छोड़ती है। और शशिकला एक बार फिर फ़िल्मी परदे पर नज़र आयीं। और जब वापसी हुई तो “दुल्हन वही जो पिया मन भाए”, सरगम और ख़ूबसूरत जैसी बेहतरीन फिल्में कीं। पर दौर बदल रहा था जिसके साथ तालमेल बिठाना उनके लिए थोड़ा मुश्किल हो रहा था।

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फिर 1988 की फ़िल्म “घर-घर की कहानी” के सेट पर उन्हें कुछ कड़वे अनुभव हुए जिसके बाद उन्होंने फ़िल्मों को अलविदा कहने का मन बना लिया। उस समय उनकी निजी ज़िन्दगी में भी हलचल मची थी। पति से उनके रिश्ते बिगड़ गए थे। ऐसे में उनका झुकाव अध्यात्म की तरफ हुआ और वो तीर्थ यात्रा पर निकल गई। जगह-जगह घूमने के बाद जब वो मदर टेरेसा के संपर्क में आईं तो उन्हें वो शान्ति मिली जिसकी तलाश में वो भटकती रहीं थीं। 1993 में जब वो लौटी तब तक वो भावनात्मक और मानसिक रूप से काफ़ी मज़बूत हो चुकी थीं।

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90 के दशक में शशिकला ने टी वी धारावाहिकों के ज़रिये अभिनय में वापसी की और फिर  बादशाह, चोरी चोरी, कभी ख़ुशी कभी ग़म और मुझसे शादी करोगी जैसी कुछ फिल्मों में भी अभिनय किया। 100 से ज़्यादा फ़िल्मों में अभिनय करने वाली शशिकला को आरती के अलावा गुमराह फ़िल्म के लिए भी सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया। गुजराती फ़िल्म “सत्यवान सावित्री” के लिए उन्हें गुजरात सरकार का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया। 2007 में पद्मश्री और 2009 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से उन्हें नवाज़ा गया।

शशिकला

आमतौर पर फ़िल्मों में जो मशहूर वैम्प होती हैं, उनका ताल्लुक़ किसी और ही दुनिया से दिखता है। शशिकला ने ऐसे नेगेटिव किरदार निभाए जो हमें अक्सर अपने आस-पास नज़र आ जाते हैं। उनके नेगेटिव रोल्स इतने रियल थे या कहें कि उन्होंने इतने असरदार तरीक़े से उन्हें निभाया कि उस दौर में लोग उन्हें असल ज़िन्दगी में भी वैसा ही समझने लगे थे। एक कलाकार के लिए इससे बड़ी कामयाबी और क्या हो सकती है। 4 अप्रैल 2021 को शशिकला की मौत हो गई, आज वो हमारे बीच नहीं हैं, और जो जगह उनके जाने से ख़ाली हुई है उसे भी कभी कोई नहीं भर पायेगा।