मनोज कुमारमनोज कुमार

मनोज कुमार के 85 वें जन्मदिन पर उनकी ज़िंदगी और फ़िल्म करियर की कुछ ख़ास बातें।

बचपन से हर नेशनल डे पर मनोज कुमार की फ़िल्मों के गाने की सुनने की आदत सी हो गई थी। अभी काफ़ी कुछ बदल गया है मगर फिर भी कहीं न कहीं उनके देशभक्ति गीत सुनाई दे ही जाते हैं। उन्होंने कई शानदार देशभक्ति फिल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों को जीता और ज्यादातर फिल्मों में मनोज कुमार के किरदार का नाम भारत था, इस वजह से लोग उन्हें ‘भारत कुमार’ कहने लगे। अब तो वो लंबे अरसे से फिल्में से दूर हैं लेकिन उनकी फिल्में आज भी उनकी जबरदस्त एक्टिंग और निर्देशन की कहानी बयाँ करती है।

यूँ तो अमूमन मनोज कुमार किसी भी कंट्रोवर्सी से दूर रहते हैं पर आख़िरी बार जब बड़े स्तर पर उनके नाम की चर्चा हुई थी वो एक कंट्रोवर्सी की वजह से ही हुई थी। शाहरुख ख़ान ने अपनी फिल्म ‘ओम शांति ओम’ के एक सीन में मनोज कुमार की नक़्ल वाला एक सीन रखा था, उससे मनोज कुमार बहुत आहत हुए और उन्होंने उस सीन पर खुल कर अपनी नाराज़गी जताई।

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आपको याद होगा उस समय कुछ चलन सा बन गया था, दूसरों का मज़ाक़ बनाने का। अवॉर्ड फंक्शन्स में भी ऐसा बहुत होने लगा था, कई लोगों के ऐतराज़ के बाद ये सिलसिला रुका। हाँलाकि शाहरुख ख़ान ने मनोज कुमार से माफी मांग ली और मनोज कुमार ने भी उस क़िस्से को भुला दिया। क्योंकि वो बेहद साफ़ दिल के साधारण इंसान हैं और वो बातों को दिल से भले ही लगा लें, पर तूल नहीं देते।

मनोज कुमार के एक इंटरव्यू के मुताबिक़ – जब लगातार विफलताओं से हताश होकर अमिताभ बच्चन मुंबई छोड़कर अपने मां-बाप के पास दिल्ली वापस जा रहे थे तब उन्होंने अमिताभ बच्चन को रोका और अपनी फिल्म “रोटी कपड़ा और मकान” में मौक़ा दिया। मनोज कुमार कहते हैं, “जब लोग अमिताभ को नाकामयाबी की वजह से ताने दे रहे थे, तब भी मुझे उन पर पूरा भरोसा था कि वो एक दिन बहुत बड़े स्टार बनेंगे।” एक इंसान को आगे बढ़ने में कितने लोगों का हाथ होता है और कितने लोगों की दुआएँ!

मनोज कुमार

मनोज कुमार का शुरूआती जीवन

मनोज कुमार का असली नाम है -हरिकिशन गिरी गोस्वामी। उनका जन्म 24 जुलाई 1937 को एबटाबाद में हुआ जो अब पाकिस्तान में है। विभाजन के बाद इनका पूरा परिवार दिल्ली आ गया। और दिल्ली के शरणार्थी शिविर में रहने लगा।  इस वजह से इनकी पढाई का भी काफ़ी नुक्सान हुआ। और जब पढाई शुरू हुई तो भी काफ़ी मुश्किल हुई, क्योंकि एबटाबाद में वो उर्दू माध्यम से पढ़ते आ रहे थे और दिल्ली में पूरी पढाई हिंदी में थी। पर इस मुश्किल से उर्दू के साथ साथ उन्हें हिंदी का ज्ञान भी हो गया फिर दिल्ली के ही हिन्दू कॉलेज से उन्होंने स्नातक की पढाई पूरी की।

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मनोज कुमार के कजिन लेखराज भाखड़ी फिल्म निर्माता थे। अपनी  फिल्म तांगेवाली की रिलीज़ के सिलसिले में जब वो दिल्ली आये तो उनकी मुलाक़ात मनोज कुमार से भी हुई। और इतने हैंडसम लड़के को देखकर वो बोले तुम तो बिलकुल हीरो जैसे दिखते हो, मनोज कुमार को तो जैसे मनचाही मुराद मिल गई, उन्होंने तुरन्त कहा – तो बना दो हीरो ! और वाक़ई लेख राज भाखड़ी ने उन्हें मुम्बई बुला लिया।

लेख राज भाखड़ी का ऑफिस रंजीत स्टूडियो में था तो मनोज जी रोज़ वहां जाते बैठते। उन दिनों फिल्म बन  रही थी “फैशन” जिसमें उन्होंने 19 साल की उम्र में 90 साल के बूढ़े का छोटा सा रोल किया। इसके बाद सहारा में मीना कुमारी के साथ 4-5 सीन करने को मिले फिर “चाँद” जैसी कुछ फिल्मों में छोटे-छोटे रोल किये, कुछ फ़िल्मों में बतौर घोस्ट राइटर भी काम किया। लेकिन मनोज कुमार तो हीरो बनने आये थे, ऐसे रोल्स उन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहे थे।

फ़िल्मों में कामयाबी का दौर

H S रवैल की फिल्म “काँच की गुड़िया” में मनोज कुमार पहली बार हीरो के किरदार में नज़र आये। हाँलाकि ये फिल्म नहीं चली पर फिल्म इंडस्ट्री के दरवाजे उनके लिए खुल गए। इसके बाद आई “रेशमी रुमाल” जो विजय भट्ट के भाई की फिल्म थी और इस फिल्म की वजह से मनोज कुमार को मिली विजय भट्ट की फिल्म “हरियाली और रास्ता”।

जब उन्हें इस फ़िल्म के लिए साइन किया गया था तो उनमें हीरो वाला कोई स्टाइल नहीं था। उन्हें कैमरा से इतना डर लगता था कि जैसे उसमें से कोई गोली निकलने वाली हो। उनके पैर काँपने लगते थे। फिल्म के निर्देशक विजय भट्ट और हेरोइन माला सिन्हा ने भी शूटिंग के समय उनकी बहुत मदद की और उन्हें  बहुत कुछ सिखाया। ये मनोज कुमार की हिट फिल्म रही जिसने उन्हें स्टार बना दिया। फिर तो कामयाब फिल्मों का ऐसा सिलसिला चला जिसने हमें दीं – “वो कौन थी”, “हिमालय की गोद में”, “दो बदन”, “पत्थर के सनम”, “सावन की घटा”, “गुमनाम” जैसी कई फिल्में। जिनसे एक अभिनेता के रूप में मनोज कुमार ने नई ऊँचाइयों को छुआ।

मनोज कुमार

फ़िल्मकार मनोज कुमार

मनोज कुमार जब कॉलेज में थे तो उन्होंने एक कहानी लिखी थी पर नर्वसनेस के कारण उसे स्टेज पर सुना नहीं पाए थे। पर उनके कई दोस्तों ने ये कहानी सुनी थी। ऐसे ही दोस्त थे केवल कश्यप जो उनके सेक्रेट्री भी थे, और वो उस कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे। उन्हीं के ज़ोर देने पर मनोज कुमार ने उस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी और शहीद भगत सिंह का मुख्य किरदार भी निभाया। इस फिल्म यानी “शहीद” को उस समय के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी देखा और मनोज कुमार से पूछा कि क्या उनके दिए नारे “जय जवान जय किसान’ पर फिल्म बन सकती है ?

मनोज कुमार
फिल्म उपकार के एक दृश्य में मनोज कुमार और शास्त्री जी के साथ फ़िल्म शहीद की टीम

मनोज कुमार के लिए ये बड़े गौरव की बात थी और फिर दिल्ली से मुम्बई वापसी में ट्रैन के सफर के दौरान ही उन्होंने इस अगली फिल्म की कहानी भी तैयार कर ली। वो फिल्म थी – “उपकार” जिसने निर्माता-निर्दशक-लेखक-अभिनेता मनोज कुमार को “भारत कुमार” की पहचान दी। वो घर-घर में भारत के नाम से जाने जाने लगे। भारत कुमार की उनकी छवि को और पुख्ता किया “पूरब और पश्चिम”, “शोर”, “रोटी कपड़ा और मकान”, और” क्रांति” जैसी फिल्मों ने। इन सभी फिल्मों में उनका नाम भारत ही रहा।

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“क्रांति” एक तरह से मनोज कुमार के लिए काफी महत्वपूर्ण फ़िल्म रही क्योंकि एक तो इसमें उन्होंने अपने आदर्श दिलीप कुमार को डायरेक्ट किया दूसरा उनके निर्देशन में बनी ये आख़िरी कामयाब फिल्म रही। इसके बाद आई “क्लर्क” और “जय हिन्द” जिसमें उनके बेटे कुणाल गोस्वामी ने काम किया था, कोई ख़ास कमाल नहीं दिखा पाई। अभिनेता के रूप में भी जो फिल्में आई वो उनकी भारत कुमार की छवि को भुनाती नज़र आईं। 

मनोज कुमार ने अपनी हर फिल्म में नए नए प्रयोग किये। चाहे वो अलग-अलग विषयों पर फिल्म की कहानी बुनना हो, कहानी कहने का तरीक़ा हो, कलाकारों का कैरेक्टराइज़ेशन हो। फोटोग्राफी और एडिटिंग के स्तर पर तो कई प्रयोग उस समय पहली बार उनकी फिल्मों में नज़र आये।

मनोज कुमार

उनकी निजी ज़िन्दगी की बात करें तो कॉलेज के ज़माने में उनकी मुलाक़ात हुई थी शशि जी से जिनसे बाद में उनकी शादी हुई दो बेटे हुए कुणाल और विशाल। कुणाल ने भी फिल्मों में अपना भाग्य आज़माया मगर उन्हें अपने पिता जैसी कामयाबी नहीं मिली।

अवॉर्ड्स (Awards)

पद्मश्री से सम्मानित मनोज कुमार को “उपकार” के लिए दूसरी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। फिल्मों में उनके योगदान को देखते हुए दादा साहब फाल्के अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया। “उपकार” के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर का Best Movie, Best Director, Best Dialogue और Best Story का अवार्ड दिया गया। “बे-ईमान’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार पाने वाले मनोज कुमार को “रोटी कपडा और मकान” के लिए फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट डायरेक्टर का अवार्ड मिला। 1999 में उन्हें फ़िल्मफ़ेयर के लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

शौक़

मनोज कुमार जब मुंबई आये थे तो उनके मुख्य रुप से दो सपने थे – एक तो हीरो बनना है दूसरा तीन लाख रुपया कमाना। उन्होंने सोचा था कि सफ़ेद बंगला होगा, सफ़ेद गाड़ी और वो सफ़ेद कुरता धोती में घर में बैठ कर सितार बजायेंगे। सितार को छोड़ कर बाक़ी सभी ख़्वाहिशें पूरी हो गईं, हाँ वो बाँसुरी बजा लिया करते थे। मनोज कुमार को कॉलेज के समय में खेलों में भी ख़ासी दिलचस्पी रही है। वो क्रिकेट और हॉकी के अच्छे खिलाडी थे। फ़िल्मों में आने के बाद भी खेलों के प्रति उनका रुझान बना रहा।

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उनके बारे में ये भी कहा जाता है कि अभिनय के ज़माने से ही उन्होंने होमियोपैथी पढ़ना शुरू कर दिया था और वो लोगों को दवाइयाँ भी देते थे। हाँलाकि इन दिनों वो चर्चा से दूर हैं, पिछले कई सालों से अक्सर उन्हें व्हील चेयर पर ही देखा जाता रहा है।बढ़ती उम्र की परेशानियां तो हैं ही एक चोट का भी असर है जो 70 के दशक में बैडमिंटन खेलते हुए लगी थी। उस वक़्त मनोज कुमार ने उस चोट को गंभीरता से नहीं लिया, बाद में पता चला कि उनकी रीढ़ की हड्डी में काफी गंभीर चोट आई थी, जिसकी वजह से उन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ी। उनके जन्मदिन पर हम उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

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