व्रजेंद्र गौड़

व्रजेंद्र गौड़ उन लेखकों में से थे जो फ़िल्मों में आने से पहले बतौर लेखक मक़बूलियत पा चुके थे, वो भी बहुत कम उम्र में।

व्रजेंद्र गौड़ को जब परिणीता फ़िल्म के डायलॉग लिखने के लिए उन्हें बिमल रॉय से मिलवाया गया तो बिमल रॉय ने कहा ये तो इतना छोटा है, ये क्या लिखेगा ? लेकिन फ़िल्म के प्रोडूसर और अभिनेता अशोक कुमार को उन पर विश्वास था, क्योंकि 1950 में आई उनकी फ़िल्म संग्राम के संवाद व्रजेंद्र गौड़ ने ही लिखे थे। लेकिन इस घटना के बाद से व्रजेंद्र गौड़ ने सिगरेट पीना शुरु कर दिया ताकि वो थोड़े बड़े दिखें और लोग उन्हें गंभीरता से लें।

व्रजेंद्र गौड़

 

व्रजेंद्र गौड़ की शोहरत ने फ़िल्मवालों का ध्यान खींचा

व्रजेंद्र गौड़ का जन्म हुआ इटावा में 1 अप्रैल 1925 को। वो 7 साल के थे जब उनके पिता का निधन हो गया था। ज़िंदगी में जब थोड़ी ट्रेजेडी हो जाए तो इंसान थोड़ा संवेदनशील हो ही जाता है शायद ऐसे में व्रजेंद्र गौड़ ने क़लम थामी हो। क्योंकि बचपन से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था, 15 साल की उम्र में हिंदी पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ कविताएँ छपने लगी थीं। इटावा में आगे बढ़ने का स्कोप नहीं था इसीलिए वो 20 साल की उम्र तक लखनऊ चले आए। व्रजेंद्र गौड़ ने 2 साल तक लखनऊ के सिविल सेक्रेटेरिएट में ट्रांसलेटर के तौर पर काम किया।

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रेडियो के लिए भी उन्होंने कई टॉक शो और नाटक लिखे, जो बहुत मशहूर हुए। वो प्रकाश, जय हिन्द, त्रिशक, प्रतिभा और ग्राम सुधर मैगज़ीन के एडिटर भी रहे। इसी समय उनकी छोटी कहानियों के छह वॉल्यूम छपे। उस दौर में उनकी ‘अतृप्त मानव’, ‘काग़ज़ की नाव’, ‘युद्ध की कहानियाँ’, ‘बिखरी कलियाँ’, ‘अँधेरी रात’, ‘सिंदूर की लाज’, जैसी कई रचनाएँ बहुत मशहूर हुईं। “कलकत्ता का क़त्ल-ए-आम” और “पेरोल” भारत छोडो आंदोलन पर आधारित थे इसीलिए उस समय की ब्रिटिश सरकार ने उन रचनाओं पर बैन लगा दिया था। यानी इस दौर तक साहित्य में उनका नाम हो चुका था।

व्रजेंद्र गौड़

साहित्य में किए नाम और काम ने व्रजेंद्र गौड़ को सिनेमा तक पहुँचाया। उनका एक प्ले था “ढाई लाख” जो उस समय के मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने पढ़ा था। वो नाटक सिनेमा की दुनिया पर आधारित था, उसे पढ़कर मोतीलाल बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने एक व्यक्ति को लखनऊ भेजा व्रजेंद्र गौड़ को मुंबई लाने के लिए। पहले तो व्रजेंद्र गौड़ ने इस प्रपोजल में कोई रूचि नहीं दिखाई लेकिन बहुत ज़ोर देने पर वो मुंबई आ गए।

मुंबई में कामयाबी का दौर

मुंबई आकर व्रजेंद्र गौड़ ने 1945 की फ़िल्म “सावन” में संवाद लिखे। पहली फ़िल्म थी और वृजेन्द्र गौड़ ने उस फ़िल्म के लिए भारी-भरकम लम्बे-लम्बे डायलॉग लिखे। जो साहित्य के हिसाब से बहुत अच्छे थे लेकिन फ़िल्मों में संवाद अलग क़िस्म के होते हैं। तो मोतीलाल जो अपनी नेचुरल एक्टिंग के लिए जाने जाते थे, उन्होने व्रजेंद्र गौड़ को बताया कि फ़िल्मों में किस तरह के नेचुरल, छोटे-छोटे अर्थपूर्ण संवाद होने चाहिए। लेकिन इसके बाद व्रजेंद्र गौड़ वापस लखनऊ चले गए।

दरअस्ल वो शुरु शुरू में लखनऊ से आते फ़िल्मों के डायलॉग्स या गीत लिखते और वापस चले जाते। व्रजेंद्र गौड़ की पहचान एक संवाद लेखक की रही पर उन्होंने क़रीब 11 फ़िल्मों में 48 गीत लिखे हैं। 1945 की रत्नावली वो पहली फिल्म थी जिसमें उन्होंने गीत लिखे, फिर नीरा और नंदा(1946), मंगलसूत्र (1947), गुंजन (1948), संग्राम (1950), ज़लज़ला(1952), क़ाफ़िला(1952), शमशीर(1953), कस्तूरी(1954), सरदार(1955) जैसी फ़िल्मों में उनके लिखे गीत सुनाई दिए।

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1950 में आई बॉम्बे टॉकीज़ की फ़िल्म “संग्राम” जिस में हीरो थे अशोक कुमार, इस फ़िल्म में गीत लिखने के साथ-साथ संवाद भी व्रजेंद्र गौड़ ने लिखे। ये फ़िल्म हिट हुई और उसके बाद व्रजेंद्र गौड़ पूरी तरह मुंबई आकर बस गए। साथ ही अशोक कुमार की कई फ़िल्में भी उन्हें मिल गईं क्योंकि अशोक कुमार उनके लेखन से काफ़ी प्रभावित थे। उनकी काफिला, परिणीता, सरदार, हावड़ा ब्रिज जैसी फ़िल्मों में व्रजेंद्र गौड़ ने ही डायलॉग लिखे।

व्रजेंद्र गौड़

बॉम्बे टॉकीज़ में अशोक कुमार के लिए काम करते हुए ही व्रजेंद्र गौड़ की मुलाक़ात देवानंद से हुई। देवानंद अशोक कुमार से मिलने गए थे, पर अशोक कुमार वहाँ नहीं थे तो वो वापस सीढ़ियों से उतर रहे थे और व्रजेंद्र गौड़ ऊपर जा रहे थे। देवानंद ने उन्हें बताया कि अशोक कुमार वहाँ नहीं हैं, तो दोनों वहीं सीढ़ियों पर बैठ कर उनका इंतज़ार करते रहे। और वहीं बातों बातों में ऐसी दोस्ती हुई कि फिर देवानंद की कई फ़िल्मों के डायलॉग व्रजेंद्र गौड़ ने ही लिखे। बारिश, मंज़िल, जाली नोट, बात एक रात की, तीन देवियाँ, दुनिया, महल सभी बेहतरीन फ़िल्में हैं।

1960 में आई देवानंद की फ़िल्म “मंजिल” व्रजेंद्र गौड़ के नॉवेल पर ही बनी थी। सिर्फ़ देवानंद ही नहीं उन्होंने शम्मी कपूर राजेश खन्ना अमिताभ बच्चन जैसी बड़े-बड़े स्टार्स के लिए डायलॉग्स लिखे और वो फ़िल्में हिट भी हुईं। “कटी पतंग”, “लाल पत्थर”, “शर्मीली”, “रेशम की डोरी”, “गीत गाता चल”, “दुल्हन वही जो पिया मन भाए”, “द ग्रेट गैम्बलर”, “अँखियों के झरोखों से” जैसी अनेक फ़िल्में हैं जिनसे व्रजेंद्र गौड़ का नाम जुड़ा है।

व्रजेंद्र गौड़ की वजह से शक्ति सामंत निर्देशक बने

व्रजेंद्र गौड़ को दो फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाज़ा गया और दोनों ही मिले 1977 में आई “दुल्हन वही जो पिया मन भाये” फ़िल्म के लिए। एक बेस्ट डायलॉग का अवॉर्ड और दूसरा बेस्ट स्क्रीनप्ले का अवार्ड। इस फ़िल्म के लिए बेस्ट स्क्रीनप्ले का अवार्ड तीन लोगों को दिया गया था, मधुसूदन केलकर, लेख टंडन और व्रजेंद्र गौड़। व्रजेंद्र गौड़ को लिखने का शौक़ था मगर इसी बीच एक वक़्त ऐसा आया जब उन्हें एक फ़िल्म के निर्देशन का मौक़ा मिला। ये थी सरगम पिक्चर्स की फ़िल्म “कस्तूरी” जिसमें उनके सहायक थे उस समय अपनी राह ढूँढ रहे शक्ति सामंत

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इसी समय व्रजेंद्र गौड़ को एक और फ़िल्म के निर्देशन का ऑफर आया मगर वो कस्तूरी में व्यस्त थे और  उसकी रिलीज़ से पहले कोई और फ़िल्म हाथ में नहीं ले सकते थे तो उन्होंने उस फ़िल्म के निर्देशन का मौक़ा शक्ति सामंत को दे दिया इस शर्त पर कि उसकी कहानी और डायलॉग वो ख़ुद लिखेंगे। इस तरह शक्ति सामंत को निर्देशन का मौक़ा देने वाले व्रजेंद्र गौड़ ही थे और वो फ़िल्म थी 1955 में आई “बहु”। इसके बाद जब शक्ति सामंत ने फिल्में बनाना शुरू किया तो उनकी कितनी ही फिल्मों के लेखक व्रजेंद्र गौड़ रहे।

व्रजेंद्र गौड़

हावड़ा ब्रिज, इंसान जाग उठा, जाली नोट, नॉटी बॉय, चाइना टाउन, सावन की घटा, कटी पतंग, चरित्रहीन, द ग्रेट गैम्बलर इन सभी में व्रजेंद्र गौड़ ने संवाद लिखे। और कमाल की बात ये है कि “कस्तूरी” के बाद फिर किसी और फ़िल्म का निर्देशन व्रजेंद्र गौड़ ने नहीं किया। व्रजेंद्र गौड़ का लिखने का शौक सिर्फ़ इन कामयाबियों तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने बच्चों के लिए गीत और किताबों का एक कलेक्शन भी निकाला। लेकिन उन्हें याद किया जाता है फ़िल्मों में उनके योगदान के लिए, चाहे गीत हों, या संवाद या स्क्रीनप्ले, उनके लेखन का जादू फ़िल्म में दिखाई सुनाई देता है। 1945 से लेकर 1980 तक वो लगातार फ़िल्मों के लिए लिखते रहे। 

व्रजेंद्र गौड़ की इंटरनेशनल पहचान बनी

अपने पूरे करियर में उन्होंने क़रीब 70 फ़िल्मों के लिए लिखा लेकिन अपने उसूल कभी नहीं छोड़े। उनके लेखन में आपको कभी हिंसा या बेहूदगी, भद्दापन या ग़लत भाषा नहीं मिलेगी। उन्होंने हमेशा माहौल और केरैक्टर के मुताबिक़ परफेक्ट संवाद दिए जिन्होंने किसी किरदार को अमर किया या किसी-किसी सीन को इतना ख़ास बना दिया कि वो आज भी दर्शकों के दिमाग़ में ताज़ा है।

वृजेन्द्र गौड़ “फिल्म राइटर्स एसोसिएशन” के प्रेसिडेंट भी थे और इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स के लिए फिल्में चुनने वाले जजों के पैनल में भी शामिल रहे। वो ग्रेट ब्रिटेन में मौजूद PEN (पोएट्स, एस्सेइस्ट, नॉवेलिस्ट्स) के मेंबर भी थे, और उनकी कामयाबियों की वजह से उन्हें ब्रिटेन के मशहूर लोगों की “हूज़ हू” बायोग्राफी में जगह भी मिली है।

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व्रजेंद्र गौड़ अपनी पत्नी मीना को बहुत लकी मानते थे क्योंकि शादी के बाद ही व्रजेंद्र गौड़ को कामयाबी मिलनी शुरू हुई। उनके दो बेटे हैं राजेश और सुनील जिन्होंने अपने पिता पर एक किताब भी लिखी है। 7 अगस्त 1980 को सिर्फ़ 55 साल की उम्र में व्रजेंद्र गौड़ इस दुनिया से चले गए। लेकिन जैसा कि धर्मेंद्र ने उनके बारे में कहा कि वो फ़िल्म राइटर्स के कोहिनूर थे। और जिस तरह की फ़िल्में और संवाद वो लिख गए हैं वो हमेशा याद किए जाते रहेंगे।

व्रजेंद्र गौड़

व्रजेंद्र गौड़ की फ़िल्मों की सूची

  1. रत्नावली (1945) – गीत
  2. नीरा और नंदा (1946) – गीत
  3. मंगलसूत्र (1947) – गीत
  4. गुंजन (1948) – गीत
  5. गर्ल्स स्कूल (1949) – संवाद
  6. संग्राम (1950) – संवाद और गीत
  7. मुकद्दर (1950) – गीत
  8. ज़लज़ला (1952) – गीत
  9. काफिला (1952) – गीत
  10. परिणीता (1953) – हिंदी संवाद
  11. शमशीर (1953) – गीत
  12. कस्तूरी (1954) – डायरेक्शन, गीत, कहानी, संवाद
  13. सरदार (1955) – गीत
  14. बहू (1955) – संवाद
  15. शतरंज (1956) – संवाद
  16. बारिश (1957) – संवाद
  17. अपराधी कौन? (1957) – संवाद
  18. सितारों से आगे (1958) – संवाद
  19. हावड़ा ब्रिज (1958) – संवाद
  20. इंसान जाग उठा (1959) – संवाद
  21. जाल साज़ (1959) – संवाद
  22. मंज़िल (1960)- राइटर
  23. सरहद (1960) –
  24. सिंगापुर (1960) – संवाद
  25. जाली नोट (1960) –
  26. झुमरू (1961) – संवाद
  27. पासपोर्ट (1961) – संवाद, कहानी
  28. प्यार का सागर (1961) – संवाद
  29. रामू दादा (1961) – संवाद
  30. अपना बनाकर देखो (1962) – संवाद
  31. बात एक रात की (1962) – संवाद
  32. नॉटी बॉय (1962) – संवाद
  33. चाइना टाउन (1962) – संवाद
  34. शिकारी (1963) – स्क्रीनप्ले और संवाद
  35. तीन देवियां (1965) – संवाद
  36. प्यार मोहब्बत (1966) –
  37. सावन की घटा (1966) –  संवाद
  38. दुनिया (1968) – संवाद
  39. सरस्वतीचंद्र (1968) – स्क्रीनप्ले
  40. एक कली मुस्काई (1968) – संवाद
  41. जाल साज़ (1969) – संवाद
  42. महल (1969) – संवाद
  43. साजन (1969) – संवाद
  44. कटी पतंग (1970) – संवाद
  45. एलान (1971) –
  46. जाने-अनजाने (1971) – संवाद
  47. लाल पत्थर (1971) – संवाद
  48. शर्मीली (1971) – संवाद
  49. जंगल में मंगल (1972) – संवाद
  50. एक मुट्ठी आसमान (1973) – संवाद
  51. खून खून (1973) –
  52. चरित्रहीन (1974) – संवाद
  53. पॉकेट मार (1974) – संवाद
  54. रेशम की डोरी (1974) – संवाद
  55. त्रिमूर्ति (1974) – संवाद
  56. आरोप (1974) – संवाद
  57. वारंट (1975) – संवाद
  58. गीत गाता चल (1975) – संवाद
  59. दुल्हन वही जो पिया मन भाए (1977) – स्क्रीनप्ले और संवाद
  60. चानी (1977) – संवाद
  61. अंखियों के झरोखों से (1978) – संवाद
  62. सलाम मेमसाब (1979) – संवाद
  63. द ग्रेट गैम्बलर (1979) – संवाद
  64. साजन मेरे मैं साजन की (1980) – संवाद
  65. ज्योति (1981) – संवाद
  66. परख (1987) –
  67. परछाईं (1989) – संवाद और गीत