ओ पी नैयर

ओ पी नैयर 50s 60s दशक के सबसे लोकप्रिय संगीतकारों में से एक हैं। 16 जनवरी 1926 को उनका जन्म हुआ, उनकी सौवीं जयंती पर उनके म्यूज़िक स्टाइल और उनके व्यक्तित्व से जुड़े कुछ पहलुओं पर एक नज़र।

ओ पी नैयर जितना अपनी बनाई मधुर धुनों के लिए जाने जाते हैं उतना ही अपने अक्खड़ स्वभाव के लिए भी जाने जाते रहे। कुछ लोग तो उन्हें अभिमानी भी कहते थे जो शायद उनके लिए स्वाभिमान था। आपने ऐसे कई क़िस्से सुने होंगे कि किसी रिकॉर्डिंग पर ओ पी नैयर अपनी पसंद के गायक से गीत गवाने पर अड़ गए या ग़लती होने पर भी रि-रिकॉर्ड नहीं किया। और भी कई क़िस्से हैं उनके व्यवहार से जुड़े हुए लेकिन इस व्यवहार के पीछे जो परफेक्शनिस्ट और नर्मदिल इंसान है उसकी बात बहुत कम होती है।

ओ पी नैयर : एक दर्दमंद इंसान

एक संगीतकार के तौर पर ओ पी नैयर जानते थे कि जिस तरह साज़ के बिना आवाज़ अधूरी है उसी तरह साज़िन्दों के बिना संगीतकार अधूरा है। वो अपने साज़िन्दों और सहायकों का बहुत ख़याल रखते थे। रिकॉर्डिंग से पहले हर गाने की कई रिहर्सल्स होती थीं, सब कुछ ठीक होने पर भी ओ पी नैयर रिकॉर्डिंग से पहले स्टूडियो में बैठे हर वादक के पास जाते थे और पता करते थे कि उनकी तैयारी कितनी है। अगर कोई वादक कॉन्फिडेंन्ट महसूस नहीं कर रहा होता, तो एक और रिहर्सल करवाते थे।

ओ पी नैयर

पर समय की कमी हो तो उस म्यूजिशियन को वहां से हटाते नहीं थे बल्कि कहते कि अपनी जगह पर बैठ कर साज़ बजाने का दिखावा करे पर असल में साज़ न बजाए। ताकि उस और म्यूजिशियन को उस दिन की पूरी तनख्वाह मिल सके। आज बहुत लोगों को ये  बेवक़ूफ़ी लग सकती हैं मगर यहाँ हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि म्यूजिक डायरेक्टर को फ़िल्म के हिसाब से पैसे मिलते थे मगर म्यूजिशियन का घर रोज़ की रिकॉर्डिंग से मिले पैसों से ही चलता है। ओ पी नैयर के इस क़दम से म्यूजिशियन का आत्मविश्वास भी बना रहता था और पैसों का नुक्सान भी नहीं होता था।

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किसी फ़िल्म पर काम शुरू करने से पहले ही वो प्रोड्यूसर के साथ एग्रीमेंट कर लेते थे कि हरेक म्यूजिशियन को रिकॉर्डिंग ख़त्म होते ही पैसे दिए जाएँगे और सभी को बराबर पैसे दिए जाएँगे, चाहे गाने में उनका कम कम हो या ज़्यादा। ऐसा एग्रीमेंट करने वाले वो पहले म्यूजिक डायरेक्टर थे। बर्जर लॉर्ड जो परकशन इंस्ट्रूमेंट्स बजाने में माहिर हैं, ख़ासकर ड्रम में तो उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पाई।

उन्हें ओ पी नैयर की रिकॉर्डिंग में वाइब्राफोन बजाने के लिए बुलाया गया था। सारी रिकॉर्डिंग में उन्होंने बस तीन बार वाइब्राफोन पर एक ‘टुँग’ बजाया। लेकिन रिकॉर्डिंग पूरी होने के बाद उन्हें बाकी म्यूजिशियन की तरह पूरे पैसे और आने-जाने का किराया दिया गया। सिर्फ़ साजिंदों के लिए ही नहीं ओ पी नैयरअपने साथी संगीतकारों के लिए भी बहुत इज़्ज़त और नर्मदिली रखते थे।

ओ पी नैयर

ओरिजिनल संगीतकार कहे जाने वाले संगीतकार सज्जाद हुसैन अपने व्यवहार को लेकर बहुत बदनाम थे। लेकिन उनकी और ओ पी नैयर की काफ़ी गहरी दोस्ती थी। एक वक़्त आया जब सज्जाद हुसैन के पास काम नहीं था, तबियत भी ठीक नहीं थी। ऐसे में कई बार ओ पी नैयर उनकी ख़ैर-ख़बर लेने उनके घर जाया करते थे। जब भी जाते उनकी बेटी को बुलाते और गाना सुनाने को कहते। बच्ची का गाना सुनकर OP नैयर ख़ुश होकर उसे शाबासी देते और कभी सौ, कभी दो सौ रूपए इनाम के तौर पर बच्ची को दे देते।

सज्जाद हुसैन मना करते तो कहते कि आपको थोड़े ही दे रहा हूँ बच्ची को इनाम दे रहा हूँ। ओ पी नैयर जानते थे कि कितने भी मुश्किल हालात हों सज्जाद हुसैन उनसे कोई सीधी मदद नहीं लेंगे। इसीलिए बच्ची को पैसे देने के बहाने वो सज्जाद हुसैन की मदद कर देते थे।ओ पी नैयर ख़ुद बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति थे शायद इसीलिए वो सज्जाद हुसैन के हालात समझ पाए।

ओ पी नैयर एडवांस का चेक हमेशा अपनी जेब में रखते थे

ये तो आपने सुना होगा कि ओ पी नैयर अपने काम में किसी का दख़ल बर्दाश्त नहीं करते थे फिर चाहे बड़े से बड़ा निर्माता-निर्देशक हो, अभिनेता हो या कोई और हस्ती। उस ज़माने में पेमेंट सीधे बैंक अकाउंट में नहीं जाती थी या तो कैश पेमेंट होती थी या चेक दिया जाता था। ओ पी नैयर को जब एडवांस पेमेंट का चेक मिलता तो वो उसे तब तक बैंक में नहीं डालते थे जब तक काम पूरा न हो जाए। शायद उन्हें पता था कि उस चेक को कभी भी वापस करना पड़ सकता है। ऐसे कई क़िस्से हैं जब उन्होंने अपने काम में दखलंदाज़ी के चलते चेक वापस कर दिया।

ओ पी नैयर

शेख़ मुख़्तार ने राज कपूर को ओ पी नैयर की अहमियत समझाई

1959 में एक फ़िल्म आई थी दो उस्ताद, निर्माता थे शेख़ मुख़्तार जो ख़ुद एक मशहूर अभिनेता थे और उस फ़िल्म में भी अभिनय कर रहे थे। लेकिन फिल्म के हीरो थे राज कपूर, और आवारा के बाद से मुकेश राज कपूर की आवाज़ बन चुके थे राज कपूर इस फ़िल्म में भी अपने लिए मुकेश की आवाज़ ही चाहते थे पर ओ पी नैयर इसके लिए तैयार नहीं हुए। राज कपूर ने उन्हें कन्विंस करने की बहुत कोशिश की।

यहाँ तक कि कुछ अनबन भी हो गई और जब सिचुएशन बिगड़ने लगी तो ओ पी नैयर सीधे निर्माता शेख़ मुख़्तार के पास गए और उन्हें एडवांस का चेक वापस कर दिया। कहते हैं सारी बात सुनकर शेख मुख़्तार ने उन्हें उनका चेक वापस किया और राज कपूर को बुलाकर कहा कि इस फिल्म का नाम दो उस्ताद है। एक उस्ताद मैं हूँ, और दूसरे हैं नैयर साहब, ये रुतबा था OP नैयर का।

ओ पी नैयर कभी री-रिकॉर्डिंग नहीं करते थे

ओ पी नैयर के बारे में एक और बात बहुत मशहूर है कि वो फर्स्ट टेक में ही रिकॉर्डिंग कम्पलीट करते थे। जिस तरह से वो रिहर्सल्स कराते थे, वो इतनी एक्सीलेंट हुआ करती थीं कि दूसरा टेक लेने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी। अगर ग़लती से कोई ग़लती हो जाए तब भी वो दोबारा रिकॉर्डिंग प्रेफर नहीं करते थे। ऐसा ही हुआ ‘बाप रे बाप’ फ़िल्म के मशहूर गीत “पिया पिया पिया मोरा जिया पुकारे हम भी चलेंगे संग संग तुम्हारे” के साथ।

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इस गाने की रिकॉर्डिंग हो रही थी, जिसमें किशोर कुमार को अंतरे की लाइन दो बार रिपीट करनी थी और उसके बाद आशा भोसले को आलाप लेकर गाना शुरू करना था। दूसरे अन्तरे में आशा भोसले से एक ग़लती हो गई।  किशोर कुमार ने जब अपनी पंक्ति पहली बार गाई, तभी आशा भोसले ने आलाप शुरू किया, फिर जैसे ही अपनी ग़लती समझ में आई वो एकदम चुप हो गईं। ग़लती हुई है इसका पता तो सबको चल गया था लेकिन ओ पी नैयर ने कोई इशारा नहीं किया था इसलिए रिकॉर्डिंग जारी रही।

ओ पी नैयर

रिकॉर्डिंग ख़त्म होने के बाद चर्चा हुई कि रिकॉर्डिंग दोबारा होनी चाहिए लेकिन ओ पी नैयर ने दोबारा रिकॉर्डिंग करने से साफ़ मना कर दिया। आख़िरकार किशोर कुमार ने इसका हल निकाला। फ़िल्म के हीरो वही थे और गाना भी उन पर और चाँद उस्मानी पर फ़िल्माया जाना था तो उन्होंने कहा कि वो इस ग़लती को शूटिंग के समय संभाल लेंगे, और उन्होंने संभाला भी।

जब आप स्क्रीन पर इस गीत को देखते हैं तो दूसरे अन्तरे में किशोर दा ने पहली बार अपनी पंक्तियाँ गाईं, चाँद उस्मानी ने आलाप शुरू कर दिया, और किशोर दा ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया, और अपनी लाइनें गाना जारी रखा, इसके बाद चाँद उस्मानी ने फिर आलाप से शुरू कर अपनी लाइनें अदा कीं।

आशा भोसले और ओ पी नैयर का आख़िरी अमर गीत हुआ कंट्रोवर्सी का शिकार

दूसरे संगीतकार जहाँ मुख्य गायिका के रूप में लता मंगेशकर को चुनते थे वहीं ओ पी नैयर ने आशा भोसले को चुना और सिर्फ़ चुना नहीं आशा भोसले की आवाज़ को शुरूआती दौर में निखारने का श्रेय भी ओ पी नैयर को ही जाता है। दोनों के क़रीबी संबंधों की ख़बरें भी आती रहीं, लेकिन 70 के दशक में ये जोड़ी टूटने लगी थी। 1974 में इनकी आख़िरी फ़िल्म आई “प्राण जाए पर वचन न जाए”।

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जब 1975 के फ़िल्मफेयर अवॉर्ड्स की घोषणा हुई तो उसमें ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ फ़िल्म के गीत “चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया” के लिए आशा भोसले को सर्वश्रेष्ठ गायिका घोषित किया गया। लेकिन इस अवॉर्ड की क़िस्मत कुछ और ही थी। दरअस्ल फिल्म पूरी होने तक आशा भोसले और ओ पी नैयर के संबंधों में दरार आ चुकी थी। हालत ये थी कि फिल्म 1973 में ही सेंसर से पास हो चुकी थी, लेकिन आशा भोसले ने ज़िद पकड़ ली कि ये गाना फिल्म में नहीं जाएगा। (उसके पीछे भी एक महत्वपूर्ण घटना है जिसका ज़िक्र फिर कभी )

ओ पी नैयर

काफ़ी बातचीत के बाद भी आशा भोसले नहीं मानी तो इस गाने को फ़िल्म से हटाना पड़ा और आखिरकार 1974 में ये फ़िल्म रिलीज़ हो पाई। लेकिन इस गाने के रिकॉर्ड्स पहले ही मार्केट में आ चुके थे, इसलिए ऑडियो तो अवेलेबल है लेकिन परदे पर किसी ने इस गाने को नहीं देखा। कमाल की बात ये है कि इतनी तनातनी के बाद, इसी गाने को फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड के लिए चुन लिया गया। लेकिन आशा भोसले ने अवार्ड लेने से भी मना कर दिया, यहाँ तक कि वो अवॉर्ड फ़क्शन में गई ही नहीं।

अवॉर्ड फ़ंक्शन में आयोजकों के बहुत कहने पर ओ पी नैयर ने आशा भोसले के बिहाफ़ पर अवॉर्ड स्वीकार तो कर लिया, मगर घर वापस जाते हुए उन्होंने अपनी कार वर्ली सी फेस की तरफ़ घुमाई और उस अवॉर्ड को समंदर में फ़ेंक दिया। इसी के साथ OP नैयर और आशा भोसले का सालों पुराना वो सम्बन्ध टूट गया, जिसने हमें बहुत से पॉपुलर गीत दिए।

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ओ पी नैयर की ये सौंवी जयंती हैं, जो गाने हम आज भी सुनते हैं, वो साठ – सत्तर साल पहले बनाए गए थे। मगर उन का संगीत आज भी फ्रेश लगता है, जिस पर लोग झूमते हैं, रीमिक्स भी बनते हैं और पॉपुलर होते हैं। ये वो संगीत है जो ताउम्र ऐसा ही रहेगा फ्रेश, रेलेवेंट, पॉपुलर और अमर।