नलिनी जयवंत

नलिनी जयवंत बेहद हसीन और मासूम चेहरे वाली, बहुत ही फ़ोटोजेनिक, टैलेंटेड और स्टाइलिश अभिनेत्री थीं, जिन्होंने नाम भी कमाया, और पैसा भी, लेकिन मोहब्बत उन्हें रास नहीं आई। उन्होंने फ़िल्मों में तो अपनी पुख़्ता पहचान बनाई लेकिन निजी ज़िंदगी के दर्द भी कुछ कम नहीं रहे।

नलिनी जयवंत के पिता फ़िल्मों के सख़्त ख़िलाफ़ थे

18 फ़रवरी 1926 में मुंबई के गिरगाँव में एक पारम्परिक मराठी परिवार में नलिनी जयवंत का जन्म हुआ। दो भाइयों की एकलौती बहन थीं और पिता कस्टम ऑफ़िसर थे। नलिनी जयवंत ने 6 साल की उम्र से मुंबई के ऑल इंडिया रेडियो पर बच्चों के प्रोग्राम में गाना गाना शुरु कर दिया था। डांस का शौक़ भी बचपन से ही था, इसीलिए कथक में ट्रैंनिंग भी ली। लेकिन वो फ़िल्म लाइन में जाएंगी इस बारे में तो वो सोच भी नहीं सकती थीं। एक तो उस समय फ़िल्मों को बहुत बुरा समझा जाता था ख़ासकर महिलाओं के लिए दूसरा जब उनकी बुआ की बेटी ने फ़िल्में ज्वाइन कीं तो उनके पिता ने ही उनका बायकॉट कर दिया था।

ऐसे माहौल में भला कोई कैसे सोच सकता है कि उसका भविष्य फ़िल्मों से जुड़ा होगा ? हाँ, उन्हें फ़िल्मों से लगाव ज़रुर था जो उस समय और बढ़ गया जब उनकी कजिन ने फ़िल्मों में बहुत नाम कमाया। आप भी उन्हें जानते हैं – शोभना समर्थ, नूतन और तनूजा की माँ और काजोल की नानी। पर तक़दीर जहाँ आपको ले जाना चाहती है ले जाती है और रास्ते भी बना देती है।

नलिनी जयवंत

फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत

एक दिन नलिनी जयवंत अपनी कजिन सिस्टर शोभना समर्थ के घर एक पार्टी में गई हुई थीं, वहाँ फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी आये हुए थे। जिनमें उस समय के मशहूर फ़िल्मकार चिमनलाल देसाई और उनके बेटे वीरेंद्र देसाई भी थे, जो नेशनल स्टूडियो के लिए “राधिका” नाम से एक फ़िल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे। यहाँ दो बातें मिलती हैं एक ये कि चिमनलाल देसाई ने पार्टी में 14 साल की नलिनी जयवंत को गाते देखा तो उन्हें फ़िल्म में हीरोइन की भूमिका के लिए ऑफर दिया लेकिन नलिनी के पिता ने वो ऑफर रिजेक्ट कर दिया।

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दूसरी कहानी के मुताबिक़ ये ऑफर वीरेंद्र देसाई ने दिया पर नलिनी जयवंत के पिता के साफ़ इंकार करने पर भी उन्होंने हार नहीं मानी। फिर उन्हें पता चला नलिनी के एक चाचाजी के बारे में, जो कभी उनके टीचर हुआ करते थे। कहते हैं कि उन्हीं चाचा जी की मदद से नलिनी जयवंत के पापा को मनाया गया और फिर लगभग 15 साल की उम्र में नलिनी जयवंत “राधिका” फिल्म की हीरोइन बन गईं।

नादान उम्र की मोहब्बत

1941 में राधिका फ़िल्म प्रदर्शित हुई, उसी साल आई बहन और निर्दोष। 1942 में आँख-मिचोली और फिर 1943 में आई आदाब-अर्ज़। इन सभी फिल्मों में नलिनी जयवंत ने जहाँ अभिनय किया वहीं अपने गाने भी गाए। वो ख़ूबसूरत तो थी हीं कैमरा के सामने बहुत सहज थीं और कमाल का अभिनय भी करती थीं। इतनी ख़ूबियों के बावजूद उस नादान उम्र में की गई एक ग़लती के कारण नलिनी जयवंत का फ़िल्मी सफ़र कुछ वक़्त तक रुका रहा। वो ग़लती थी मोहब्बत।

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फ़िल्म “आदाब अर्ज़” की शूटिंग हो रही थी जिसका निर्देशन कर रहे थे वीरेंद्र देसाई। शूटिंग के दौरान वो फ़िल्म की हेरोइन नलिनी जयवंत की तरफ़ झुकते चले गए, और नलिनी जयवंत भी अपने से 15 साल बड़े और पहले से शादीशुदा वीरेंद्र देसाई से मोहब्बत कर बैठीं। दोनों शादी करना चाहते थे लेकिन ये भी पता था कि कोई भी इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि वीरेंद्र देसाई न सिर्फ़ शादीशुदा थे बल्कि पहले से 3 बच्चों के पिता थे, और उनकी पत्नी चौथी संतान को जन्म देने वाली थीं।

इसीलिए दोनों ने प्यार में अंधे होकर बिना सोचे-समझे घर से भाग जाने का फ़ैसला ले लिया, और यहीं से मुश्किलें शुरु हो गईं। वीरेंद्र देसाई की माँ अपने उसूलों को लेकर बहुत सख़्त थीं उन्होंने वीरेंद्र देसाई को घर और बिज़नेस दोनों से बेदख़ल कर दिया। न हालात में मुंबई में रहना संभव नहीं था इसलिए वीरेंद्र देसाई नलिनी जयवंत के साथ अपने चाचा के पास कोलकाता चले गए जो फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े थे। लेकिन वो भी वीरेंद्र देसाई की माँ के डर से उन्हें अपने घर में नहीं रखना चाहते थे। तो उन्होंने उन्हें अपने ऑफिस प्रिमिसेस में ठहरा दिया।

नलिनी जयवंत

कुछ महीनों तक वीरेंद्र देसाई ने कोलकाता में कई तरह के कामों में हाथ आज़माया। लेकिन जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि उनकी सही जगह फ़िल्मों में ही है इसलिए वो वापस मुंबई चले गये। मुंबई पहुँच कर वीरेंद्र देसाई और नलिनी जयवंत दोनों ने काम ढूँढना शुरु कर दिया। आख़िरकार दोनों को फ़िल्मिस्तान स्टूडियो में दो साल के कॉन्ट्रैक्ट पर काम मिला गया, कंपनी ने उन्हें रहने के लिए घर भी मुहैया कराया। हर महीने दोनों को तनख़्वाह भी मिल जाती थी मगर काम करने का मौक़ा नहीं मिल रहा था।

इसकी अलग-अलग लोग अलग-अलग वजह बताते हैं। एक वजह तो फिल्मिस्तान की अंदरुनी पॉलिटिक्स थी, कहते हैं स्टूडियो के लोगों का झुकाव अपनी हेरोइन नसीम बानो की तरफ़ था, जिसे प्रमोट करने के लिए नलिनी जयवंत के टैलंट को इग्नोर किया गया। दूसरी वजह ये थी कि वीरेंद्र देसाई ने ये शर्त रखी कि नलिनी जयवंत सिर्फ़ उनके निर्देशन में बनी फ़िल्मों में काम करेंगी। लेकिन एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता हैं सआदत हसन मंटो के एक लेख में। उनके मुताबिक़ एक्चुअली ये कॉन्ट्रैक्ट एक साल का था।

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लेकिन जिस फ़िल्म पर उन्हें काम करना था, उसकी कहानी लिखने में ही दो महीने लग गए थे और फिर पूरी तैयारी में ही सारा समय चला गया। इसलिए वीरेंद्र देसाई ने फिल्मिस्तान के मैनेजिंग डायरेक्टर रायबहादुर चुन्नीलाल से कॉन्ट्रेक्ट एक साल और आगे बढ़ाने को कहा लेकिन जब वो राज़ी नहीं हुए तो वीरेंद्र देसाई मामले को कोर्ट में ले गए और फ़ैसला उनके हक़ में सुनाया गया। कोर्ट के फ़ैसले से उनका कॉन्ट्रेक्ट रिन्यू तो हो गया मगर न तो उन्हें किसी फ़िल्म के निर्देशन का मौक़ा मिला, न ही नलिनी जयवंत को किसी फ़िल्म में अभिनय करने का अवसर। और ज़ाहिर है उस कॉन्ट्रैक्ट के ख़त्म होने के बाद उन्हें फायर कर दिया गया।

नलिनी जयवंत

नलिनी जयवंत जिनका करियर राधिका से शुरु हुआ था और शेप ले ही रहा था इस शादी के बाद करियर बचा ही नहीं था। क़रीब 3 साल बाद वो शादी भी टूट गई जिसकी वजह से सबकी ज़िंदगी उथल-पुथल हुई थी। शादी क्यों टूटी इसकी भी कोई साफ़ वजह सामने नहीं आई। शायद! ज़िंदगी की हक़ीक़त का सामना करते हुए दोनों ने जो धक्के खाए, उनसे प्यार का ख़ुमार उतर गया होगा ! पर इस शादी के टूटने से एक अच्छी बात ये हुई कि नलिनी जयवंत का करियर फिर से रफ़्तार पकड़ने लगा।

मोहब्बत ने बार-बार नलिनी जयवंत का दिल तोड़ा

नलिनी जयवंत अपनी टीनएज में तो बेहद सुन्दर थी हीं लेकिन 50 के दशक में उनकी ख़ूबसूरती अपने पूरे शबाब पर थी। करियर के हिसाब से देखें तो इस दशक में 1950 का साल नलिनी जयवंत के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ। सालों के उतार-चढाव के बाद उनके करियर ने रफ़्तार पकड़ी, जब फिल्मिस्तान की समाधि, और बॉम्बे टॉकीज़ की संग्राम रिलीज़ हुईं।

इन फ़िल्मों की रिलीज़ के साथ ही उनकी गिनती टॉप हेरोइंस में होने लगी। लेकिन यहाँ से निजी तौर पर एक दूसरा चेप्टर भी शुरु हुआ, अशोक कुमार और नलिनी जयवंत के बीच बढ़ती नज़दीक़ियों का चैप्टर। समाधि और संग्राम की कामयाबी के बाद इन दोनों की ऑन-स्क्रीन जोड़ी बहुत पसंद की जाने लगी थी। जलपरी (1952), काफ़िला (1952), नौबहार (1952), सलोनी (1952), लक़ीरें (1954), नाज़ (1954), शेरु (1957), मि एक्स (1957) जैसी फ़िल्मों में दोनों ने साथ काम किया।

नलिनी जयवंत

ऑन-स्क्रीन के साथ-साथ दोनों ऑफ़-स्क्रीन भी एक दूसरे के क़रीब आने लगे थे। इस विषय में बहुत ज़्यादा डिटेल तो नहीं मिलती मगर इसकी सच्चाई के विषय में कोई संदेह नहीं है। ख़ुद अशोक कुमार ने अपने एक इंटरव्यू में नलिनी जयवंत का नाम लिए बिना इस रिश्ते का ज़िक्र किया है। नलिनी जयवंत उनसे गहराई से जुड़ गई थीं लेकिन अशोक कुमार  शादीशुदा थे और अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते थे। ये रिश्ता अंजाम तक नहीं पहुंच सकता था, इसलिए दोनों के रास्तों को अलग होना ही था।

एक घटना ने नलिनी जयवंत का ग्लैमर की दुनिया से मोहभंग कर दिया

50 के दशक में नलिनी जयवंत का फ़िल्मी सफ़र लगातार आगे बढ़ता रहा। जादू, मुनीमजी, रेलवे प्लेटफॉर्म, दुर्गेश नंदिनी, हम सब चोर हैं, काला पानी जैसी बहुत सी हिट फ़िल्मों में वो दिखाई दीं। 1958 में आई “काला पानी” में उन्होंने एक तवायफ़ की भूमिका निभाई थी, जिस के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया। 60 के दशक में नलिनी जयवंत ने सिर्फ 5 फिल्मों में काम किया “अमर रहे ये प्यार”, “सेनापति”, ज़िंदगी और हम”, “तूफ़ान में प्यार कहाँ”, और “बॉम्बे रेसकोर्स” लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म ऐसी नहीं है जो उनकी उपलब्धियों में इज़ाफ़ा करती हो।

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करियर के लिहाज़ से भले ही 60 का दशक कुछ ख़ास नहीं रहा, मगर निजी तौर पर इस दशक को नलिनी जयवंत के जीवन का टर्निंग पॉइंट कह सकते हैं। 1961 में एक फ़िल्म आई थी “अमर रहे ये प्यार” इस फ़िल्म का निर्देशन किया था अभिनेता प्रभु दयाल ने। प्रभु दयाल उनकी ज़िंदगी में एक बार फिर प्यार की फुहार लेकर आये और इस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही दोनों ने शादी कर ली। ये फ़िल्म 1960 में ही बनकर तैयार हो गई थी, लेकिन सेंसर बोर्ड के कुछ ऑब्जेक्शंस के कारण 1961 में जाकर रिलीज़ हो पाई, फ़िल्म बहुत अच्छी बनी थी, विषय भी अच्छा था मगर चली नहीं।

नलिनी जयवंत

इस फ़िल्म के राइटर और को-प्रोडूसर राधा किशन ने बहुत मन से ये फिल्म बनाई थी और काफ़ी पैसा भी लगाया था, लेकिन जिस तरह के हालात हुए उसके कारण राधा-किशन इतने हताश हो गये कि उन्होंने आत्महत्या कर ली। इस दुर्घटना ने नलिनी जयवंत पर इतना गहरा असर डाला कि उन्होंने धीरे-धीरे ख़ुद को फ़िल्मों से अलग कर लिया। 1965 में आई “बॉम्बे रेसकोर्स” के सालों बाद नलिनी जयवंत ने 1983 की फ़िल्म नास्तिक में अभिनय किया। नास्तिक नाम की एक फ़िल्म 1954 में भी  आई थी जिसमें वो हेरोइन थीं लेकिन 1983 की नास्तिक में उन्होंने अमिताभ बच्चन की माँ का रोल अदा किया था, फिर यही उनकी आख़िरी स्क्रीन अपीयरेंस रही।

आख़िर ख़ूबसूरत चेहरों की ज़िंदगी इतनी ट्रैजिक क्यों होती है ?

2001 में नलिनी जयवंत के पति प्रभु दयाल इस दुनिया से रुख़्सत हुए, उसके बाद से वो अपने बंगले में तनहा ही रह रही थीं।  ज़्यादा किसी से मिलती नहीं थीं, कहीं आती-जाती भी नहीं थीं, उन्होंने ख़ुद को दोस्तों, रिश्तेदारों, सोसाइटी से पूरी तरह अलग-थलग कर लिया था। कुछ पालतू कुत्ते थे जिनसे उन्हें बहुत लगाव था, बस वही उनकी दुनिया बन कर रह गए थे। यूँ ही अकेले, गुमनाम रहते हुए 22 दिसम्बर 2010 को वो अपनी तनहा ज़िंदगी को हमेशा के लिए छोड़ कर चली गईं। उनकी मौत का पता भी दुनिया को 3 दिन बाद लगा।

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नलिनी जयवंत

25 साल के फ़िल्मी सफ़र में नलिनी जयवंत ने क़रीब 60 फ़िल्मों में अभिनय किया, और क़रीब 9 फ़िल्मों में 39 गाने गाये।  लाखों दिलों पर राज करने वाली, आने वाली कितनी ही अभिनेत्रियों को प्रेरित करने वाली नलिनी जयवंत की स्क्रीन प्रजेंस इतनी दमदार थी कि दिलीप कुमार जैसे अभिनेता भी उनके फ़ैन थे और उनके साथ काम करते हुए अलर्ट रहते थे। अपने स्टाइल और स्वैग से नलिनी जयवंत ने बहुत से दिलों पर राज किया मगर उनका अपना दिल शायद कभी उन ग़मों से उबर नहीं पाया जो ज़िंदगी ने उन्हें दिए। लोग मूव-ऑन तो कर लेते हैं पर क्या सच में वो बीता हुआ कुछ भी भुला पाते हैं?

एक वक़्त था जब फ़िल्मफ़ेयर ने उन्हें “द मोस्ट ब्यूटीफुल वुमन इन द मूवीज” का ख़िताब दिया था, सबसे ख़ूबसूरत अभिनेत्री। लेकिन कहते हैं न, ख़ूबसूरत चेहरों के पीछे न जाने कितने दर्द छुपे रहते हैं, और जब हम फ़िल्म इंडस्ट्री की बात करते हैं तो आपको ऐसे कितने ही ख़ूबसूरत चेहरे दिख जाएंगे जिनकी ज़िंदगी दर्द, उदासी और अकेलेपन से जूझती रही, नलिनी जयवंत भी उन्हीं में से एक थीं।