शक्ति सामंत वो फ़िल्मकार जिन्होंने हिंदी में बहुत सी म्यूज़िकल हिट्स दीं, शर्मीला टैगोर जैसी हेरोइन हिंदी फ़िल्मों में उनकी वजह से आई और राजेश खन्ना जिस फ़िल्म से सुपरस्टार बने वो भी उन्होंने ही बनाई थी। शक्ति सामंत की सौंवी जयंती पर एक नज़र उनके जीवन और उनकी फ़िल्मों पर।
शक्ति सामंत हीरो और गायक बनने के लिए मुंबई आए थे
13 जनवरी 1926 को पश्चिम बंगाल के बर्दमान में जन्मे शक्ति सामंत की स्कूली पढाई देहरादून में हुई, जहाँ उनके एक अंकल रहते थे और ग्रेजुएशन उन्होंने की कोलकाता से। बांग्ला तो उनकी मातृभाषा थी ही देहरादून के दिनों में उनकी हिंदी और उर्दू पर भी इतनी अच्छी पकड़ हो गई कि उन्होंने उर्दू सिखाई भी और भी हिंदी उर्दू की समझ ने ही मुंबई में पैर ज़माने में मदद की।
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शक्ति सामंत अपने कॉलेज के दिनों में गाना गाया करते थे और क़द काठी भी अच्छी थी इसीलिए उनके मन में अभिनेता और गायक बनने की तमन्ना जागी। पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने मुंबई से क़रीब 200 किलोमीटर दूर दपोली के एक उर्दू स्कूल में टीचर की नौकरी कर ली। उस स्कूल में शुक्रवार की छुट्टी होती थी और हर शुक्रवार शक्ति दा मुंबई पहुँच जाते और स्टूडियोज के चक्कर लगाया करते।

जिन दिनों शक्ति सामंत स्टूडियोज के चक्कर लगा रहे थे उनकी मुलाक़ात कई म्यूजिक डायरेक्टर्स से हुई, जिन्हें उन्होंने अपना गाना सुनाया। लेकिन सभी ने सलाह दी कि वो गाने का ख्याल छोड़ दें, क्योंकि उनकी आवाज़ ट्रेंड नहीं थी। फिर उनकी मुलाक़ात हुई उस समय के स्टार अशोक कुमार से, उन्होंने शक्ति सामंत को सलाह दी कि वो हीरो बनने की बजाय प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में काम करें और शक्ति सामंत ने ये सलाह मान ली। तभी तो हमें मिलीं बहुत सी कमाल की, अलग अलग जॉनर की फिल्में।
शक्ति सामंत को निर्देशन का पहला मौक़ा इत्तिफ़ाक़न मिला
मुंबई में कुछेक कोशिशों के बाद शक्ति सामंत को बॉम्बे टॉकीज़ में नौकरी मिल गई। बॉम्बे टॉकीज़ में काम करने के दौरान उन्होंने सेट पर काफ़ी समय बिताया, शूटिंग देखी, माहौल को समझा। उन दिनों बहुत सी फिल्में हिंदी और बांग्ला दोनों भाषाओं में बना करती थीं ऐसे में संवादों के सही अनुवाद की समस्या आती थी। यहाँ शक्ति सामंत की क़ाबिलियत काम आई वो संवादों का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद कर दिया करते थे। उनकी इसी क़ाबिलियत को देखते हुए ज्ञान मुखर्जी, सतीश निगम और फणी मजूमदार जैसे निर्देशकों ने उन्हें सहायक बनाया।
पर जल्दी ही उन्होंने बॉम्बे टॉकीज़ छोकर वृजेन्द्र गौड़ के साथ बतौर सहायक काम करना शुरु किया इस शर्त पर कि अगर उन्हें कोई फ़िल्म बनाने का मौक़ा मिलेगा तो वो नौकरी छोड़ देंगे। जिन दिनों वृजेन्द्र गौड़ सरगम पिक्चर्स की फ़िल्म “कस्तूरी” का निर्देशन कर रहे थे उन्हीं दिनों पाहवा ब्रदर्स मुंबई आये और वृजेन्द्र गौड़ से मिले, वो एक फ़िल्म बनाना चाहते थे।

उन्होंने वृजेन्द्र गौड़ से फ़िल्म का निर्देशन करने को कहा पर वो उस समय कस्तूरी के निर्देशन में व्यस्त थे उसकी रिलीज़ से पहले कोई और फ़िल्म नहीं ले सकते थे तो उन्होंने निर्देशन का मौक़ा शक्ति सामंत को दे दिया इस शर्त पर कि फ़िल्म की कहानी और डायलॉग वो लिखेंगे। इस तरह शक्ति सामंत को उनकी पहली फ़िल्म मिली “बहु” जो 1955 में आई।
शम्मी कपूर और शर्मीला टैगोर से था ख़ास लगाव
निर्देशक के रूप में शक्ति सामंत को सफलता मिली 1956 में आई “इंस्पेक्टर” फ़िल्म से। उसके बाद शेरु, डिटेक्टिव और हिल स्टेशन जैसी कुछ फ़िल्मों की कामयाबी के बाद उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी “शक्ति फ़िल्म्स” की शुरुआत की। जिस की पहली फ़िल्म थी एक मर्डर मिस्ट्री जिसकी कहानी बनी अस्पताल के बेड पर। शक्ति सामंत का एक एक्सीडेंट हुआ था और जब वो अस्पताल में ठीक हो रहे थे तब उन्होंने “हावड़ा ब्रिज” की कहानी बुनी और अशोक कुमार को सुनाई जो फ़िल्म के हीरो थे।
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अशोक कुमार ने ही मधुबाला को राज़ी किया और कहते हैं कि मधुबाला को सिर्फ़ 1 रूपए में साइन किया गया था। हावड़ा ब्रिज में OP नैयर ने संगीत दिया था और उनकी धुनें शक्ति सामंत को इतनी पसंद आईं कि उन्होंने तय सीमा से दो गाने ज़्यादा बनाए। फ़िल्म सुपर हिट रही और यहीं से बतौर निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत का करियर ऊँचाइयों की तरफ़ बढ़ने लगा।
शक्ति सामंत शम्मी कपूर को तो बेहद पसंद करते थे, उनके साथ लगातार काम करते रहना चाहते थे। मगर ख़ुद शम्मी कपूर के लिए ये संभव नहीं था बाद में तो उनके लगातार बढ़ते वज़न के कारण वो चरित्र भूमिकाओं में ही दिखाई देने लगे। सिंगापुर से शुरु हुआ ये साथ चाइना टाउन, कश्मीर की कली, AN EVENING IN PARIS, जाने अनजाने और पगला कहीं का जैसी सुपरहिट म्यूजिकल तक चला।

एन इवनिंग इन पेरिस का एक गाना है “आसमान से आया फ़रिश्ता” इस गाने की शूटिंग से पहले इसके पिक्चराइज़ेशन पर डिस्कशन हो रहा था, शम्मी कपूर ने यूँ ही मज़ाक़ में कह दिया कि अगर इसमें हेलिकॉप्टर होता तो कुछ अलग ही बात होती और शक्ति सामंत सचमुच हेलीकाप्टर ले आए। हेलीकाप्टर तो आ गया लेकिन परेशानी शम्मी कपूर को ही हुई।
एक तो उन्हें 100 फ़ीट की ऊँचाई पर हेलीकॉप्टर से लटकना पड़ा। दूसरा इतनी ऊँचाई पर हेलीकॉप्टर की आवाज़ में गाने के बोल ही सुनाई नहीं दे रहे थे, तो लिपसिंक कैसे हो, एक्सप्रेशन कैसे दें। आख़िर में ये बड़ा ही यूनिक हल निकाला गया। जब गाना शुरू होता तो शक्ति सामंत ख़ुद गाना गाते, और उनके हिलते होंठों को देखकर शम्मी कपूर लिपसिंक करते, तब जाकर ये गाना शूट हुआ।
शम्मी कपूर के अलावा शर्मीला टैगोर के साथ भी शक्ति सामंत ने कई फ़िल्में दीं। हिंदी फ़िल्मों में “कश्मीर की कली” फ़िल्म से उन्होंने ही शर्मीला टैगोर को लांच किया इसके बाद सावन की घटा, एन इवनिंग इन पेरिस, आराधना, अमर प्रेम, अमानुष जैसी फिल्में आईं। वो तो “कटी पतंग” में भी शर्मीला टैगोर को ही लेना चाहते थे पर उन दिनों वो गर्भवती थीं, इसलिए उन्होंने आशा पारेख को लिया। कटी पतंग में एक बेहद संजीदा रोल के लिए आशा पारेख को फिल्मफेयर का बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड मिला।
आराधना : एक न्यूकमर को सुपरस्टार बनाने वाली फ़िल्म
आराधना की बात किए बिना शक्ति सामंत की बात पूरी ही नहीं हो सकती। ये एक बहुत ही महत्वपूर्ण फ़िल्म थी, सिर्फ़ शक्ति सामंत की ही नहीं, हिंदी फ़िल्म इतिहास की भी, जिसने एक न्यूकमर को रातों रात ऐसा सुपरस्टार बना दिया जिसके लिए दर्शकों में जिस तरह की दीवानगी थी वो उससे पहले कभी नहीं देखी गई। कहते हैं डिस्ट्रीब्यूटर्स चाहते थे कि फ़िल्म में हीरो राजेश खन्ना के बेटे का रोल किसी और अभिनेता से कराया जाए।
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उन्हें राजेश खन्ना से कोई परेशानी नहीं थी बस उन्हें डर था कि हीरो जब हेरोइन को माँ कहकर बुलाएगा तो शायद दर्शक इसे स्वीकार न करें। मगर शक्ति सामंत ने ये बात नहीं मानी और फ़िल्म जैसी थी वैसे ही रिलीज़ की गई, और फिर तो इतिहास रचा गया। राजेश खन्ना का अपीयरेंस परदे पर अलग कैसे लगे, इसके लिए शक्ति सामंत ने एक तो उन्हें मूछें लगाईं दूसरा उनसे कहा कि वो बेटे के किरदार में देवानंद वाला फ़ील ले आएँ, और इस तरह बेटे का किरदार पिता राजेश खन्ना से अलग दर्शाया गया।
शक्ति सामंत एयरफोर्स में जाना चाहते थे, उन्होंने एग्जाम भी दे दिया था और पास भी हो गए थे। लेकिन उनकी माँ ने इजाज़त नहीं दी क्योंकि शक्ति सामंत ने अपने पिता को बचपन में ही खो दिया था। इसीलिए उनकी माँ उन्हें ऐसी नौकरी नहीं करने देना चाहती थीं जिसमें ख़तरा हो। अपनी इस ख़्वाहिश को उन्होंने आराधना में पूरा किया हीरो को एयरफोर्स पायलट बना कर।

आराधना को मुंबई से एक हफ्ता पहले दिल्ली में रिलीज़ किया गया। दिल्ली प्रीमियर से ही अंदाज़ा था कि एक नए स्टार का जन्म हो गया है। क्योंकि दिल्ली में जब पहला शो खत्म हुआ, तो उसके बाद थिएटर में हर कोई राजेश खन्ना से मिलना चाहता था। फ़िल्म के मुंबई में रिलीज़ होने से पहले ही आराधना पर ब्लॉकबस्टर का लेबल लग गया था। टिकट विंडो पर लम्बी-लम्बी लाइनें दिखना आम बात थी। आराधना चेन्नई और बेंगलुरु जैसे गैर-हिंदी भाषी शहरों में 100 हफ़्ते तक चलने वाली पहली फ़िल्मों में से एक बन गई थी।
आराधना के समय शर्मीला टैगोर अपने पीक पर थीं, वो ये फ़िल्म तो करना चाहती थीं मगर एक बुज़ुर्ग माँ के तौर पर अपने बालों में सफेदी नहीं लगाना चाहती थीं। क्योकि उस समय टाइप्ड होने का खतरा बहुत ज़्यादा होता था। उनका कहना था कि उनकी माँ भी उसी उम्र की हैं मगर उनके बाल सफ़ेद नहीं हैं मगर शक्ति सामंत ने उन्हें समझाया कि बालों में सफेदी लगाए बग़ैर परदे पर अंतर पता नहीं चलेगा। इसके लिए उन्होंने एक दिन का स्पेशल शूट रखा और समझाया कि जब वो पति और बेटे के साथ होंगी तो डिफरेंस कैसे नज़र आएगा। तब जाकर शर्मीला टैगोर ने अपने बालों में सफ़ेदी लगाई।
रोमांटिक फिल्मों के इतिहास में आराधना एक टर्निंग पॉइंट थी। आराधना फिल्म तो हिट थी ही उसके गाने भी सुपरहिट थे, उस के रिकॉर्ड की बिक्री से शक्ति सामंत ने इतना पैसा कमाया कि उनकी अगली पांच फिल्में उसी से बन गईं। आराधना के रिकॉर्ड को 5 भाषाओं में डब करके रिलीज़ किया गया था, और वो हर भाषा में हिट हुआ था।
शक्ति सामंत की हिट टीम
इस फ़िल्म ने फ़िल्म से जुड़े बहुत लोगों की क़िस्मत बदल दी। किशोर कुमार भी आराधना” से मशहूर हुए और फिर राजेश खन्ना की प्रमुख आवाज़ बने साथ ही शक्ति फ़िल्म्स के लीड प्लेबैक सिंगर भी। इस फिल्म के बाद आनंद बख्शी शक्ति सामंत की ज़्यादातर फिल्मों के गीतकार बने रहे। कटी पतंग से RD बर्मन भी इस टीम का हिस्सा बन गए जिसमें राजेश खन्ना, किशोर कुमार, पंचम, और आनंद बख़्शी थे और इस टीम ने हिंदी फ़िल्मों में कुछ बेहद यादगार गीत दिए। उनकी लगभग सभी फ़िल्मों का म्यूज़िक लाजवाब है, यादगार है और सदाबहार है। ऐसा है जो आज भी कानों में रस घोल देता है।

आराधना के बाद “कटी पतंग” (1971) और फिर “अमर प्रेम” (1972) दोनों ही अपनी ही तरह की अलग फ़िल्में थीं जिन्होंने शक्ति फ़िल्म्स की रेपुटेशन को तो बढ़ाया ही राजेश खन्ना के स्टारडम को और चमकाया। ख़ास तौर पर अमर प्रेम तो बहुत ही ख़ूबसूरत फ़िल्म है जो शक्ति सामंत ने बनाई। बहुत सी सेंसिटिव स्टोरीलाइन, बेहद उम्दा गीत और शांत लहरों सा संगीत। इन सबने इसे क्लासिक फ़िल्म का दर्जा दिलाया।
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अनुराग, चरित्रहीन, अजनबी, अनुरोध, द ग्रेट गैम्बलर जैसी कई फिल्में फिल्में शक्ति फ़िल्म्स के बैनर से निकलीं। 80 के दशक में भी उनकी कुछ फ़िल्में आईं मगर उन्होंने शक्ति सामंत के फ़िल्मी सफर में कुछ ख़ास जोड़ा नहीं। ब्लैक एंड वाइट इरा से लेकर कलर फ़िल्म्स तक शक्ति सामंत ने 37 हिंदी और 6 बांग्ला फ़िल्मों का निर्देशन किया, और फ़िल्म इतिहास में अपनी मख़सूस जगह बनाई। उनकी बनाई मनोरंजक, रोमांटिक, म्यूज़िकल फिल्में हमेशा फ़िल्म प्रेमियों के ज़हन में उनकी याद उनके नाम को ज़िंदा रखेंगी।