सी रामचंद्र

सी रामचंद्र ने अपने पूरे करियर में विविधता भरा संगीत दिया है, हरेक सिचुएशन के मुताबिक़ धुनें बनाई मगर अपने मस्ती भरे, हल्के-फुल्के गीतों के लिए वो ज़्यादा जाने जाते हैं।

जब सी रामचंद्र ने इंडस्ट्री में क़दम रखा था, तो उस ज़माने में उनका म्यूज़िक स्टाइल दूसरे संगीतकारों (आर सी बोराल, पंकज मलिक, केशवराव भोले, सरस्वती देवी, तिमिर बरन, रफीक़ गज़नवी, मास्टर कृष्ण राव, उस्ताद झंडे ख़ान, गोविंद राव टेम्बे, ज्ञान दत्त, रामचन्द्र पाल, अशोक घोष आदि) से काफ़ी अलग था। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत से ज़्यादा वेस्टर्न ऋदम का प्रयोग किया। अपने हलके-फुल्के गीतों के इन प्रयोगों से वो आम लोगों में तो बहुत पॉपुलर हुए मगर उस समय के कई संगीतकारों को उनका ये काम पसंद नहीं आता था।

सी रामचंद्र

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सी रामचंद्र को अपने सुपरहिट गीत के लिए डाँट खानी पड़ी थी

1947 में फ़िल्मिस्तान स्टूडियो की एक फ़िल्म आई थी ‘शहनाई’ जिसमें सी रामचंद्र का कंपोज़ किया गाना “आना मेरी जान मेरी जान संडे के संडे” बहुत लोकप्रिय हुआ था।फ़िल्मिस्तान स्टूडियो के म्यूजिक डिपार्टमेंट में सी रामचंद्र और अनिल बिस्वास दोनों काम करते थे। अनिल बिस्वास सीनियर थे और सी रामचंद्र उनकी सलाह लेकर ही काम किया किया करते थे। जिन दिनों वो इस गाने का म्यूज़िक बना रहे थे, उन दिनों अनिल बिस्वास किसी काम से बाहर गए हुए थे। तो सी रामचंद्र ने निर्देशक-गीतकार पी एल संतोषी के साथ मिलकर ये गाना तैयार कर लिया।

सी रामचंद्र

लेकिन सी रामचंद्र को डर था कि अनिल बिस्वास इसे रिजेक्ट कर देंगे, क्योंकि ये धुन उस समय की शास्त्रीय परंपरा वाले संगीत के चलन से बहुत अलग थी। हुआ भी वही, जब अनिल बिस्वास वापस आये और ये गाना सुना तो उनके चेहरे से ही पता चल रहा था कि उन्हें बहुत गुस्सा आ रहा है। सी रामचंद्र ने डरते-डरते सवालिया नज़रों से उनकी तरफ़ देखा तो अनिल बिस्वास ने कहा – “काम तो तूने जूते खाने लायक़ किया है मगर ये चलेगा ख़ूब”। और वाक़ई ये गाना बहुत चला, आज तक लोग इसे पसंद करते हैं।इस गाने की धुन सी रामचंद्र ने गोवा में एक बटलर के मुँह से सुनी थी।

सी रामचंद्र बहुत जल्दी धुनें बना लेते थे

C. रामचन्द्र के ऑर्केस्ट्रा में चिक-चॉकलेट जैसे गोवा के कई वादक भी थे और इसी वजह से उनके कितने ही मस्ती भरे गानों में गोवा की रिदम झलकती है। सी रामचंद्र के हलके फुल्के गीतों में गज़ब की spontaneity भी मिलती है, जो कि काफ़ी हद तक उनमें भी थी। वो कुछ ही घंटों में धुनें बना लेते थे, उनका ऑर्केस्ट्रा भी सेट कर लेते थे और जब गाना तैयार हो जाता था तो कभी-कभी उसे आवाज़ भी खुद ही दे देते थे – चितलकर के नाम से।

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सी रामचंद्र की spontaneity का एक महत्वपूर्ण उदहारण हैं 1953 में आई फिल्म ‘अनारकली’ के गाने। उन दिनों C. रामचन्द्र अपनी फिल्म “झांझर” के निर्माण में लगे थे, इसी वजह से निर्माता को लगा कि वो उनकी फ़िल्म ‘अनारकली’ पर ध्यान नहीं दे रहे है। लिहाज़ा उन्होंने C. रामचन्द्र को क़ानूनी नोटिस थमा दिया। ये देखकर C. रामचन्द्र ने जल्दी-जल्दी गाने बनाये, यहाँ तक कि एक दिन में चार गाने रिकॉर्ड कर डाले, और वो सभी गाने हिट भी हुए। पर क्या अनारकली के गाने सुनकर ये एहसास होता है कि उन्हें जल्दी में बनाया गया है !

सी रामचंद्र

1955 की फ़िल्म ‘आज़ाद’ के गाने भी सी रामचंद्र की क़ाबिलियत की एक मिसाल हैं। ‘आज़ाद’ तमिल की हिट फिल्म “मलाईकल्लन” का हिंदी रीमेक है, जिसमें हीरो थे दिलीप कुमार और संगीतकार के तौर पर नौशाद हमेशा दिलीप कुमार की पहली पसंद होते थे। इसलिए ‘आज़ाद’ के प्रोड्यूसर S M नायडू ने सबसे पहले संगीतकार नौशाद को अप्रोच किया। लेकिन समय बेहद कम था, सिर्फ़ एक महीना जिसमें नौशाद को क़रीब दस गाने बनाने थे। नौशाद ने ये कहकर ये प्रस्ताव ठुकरा दिया कि वो इतनी जल्दी संगीत नहीं बना सकते। संगीतकार नौशाद का कहना था कि वो बनिए की दुकान की तरह काम नहीं करते।

सी रामचंद्र ने गाने बनाने के लिए राजेंद्र कृष्ण को कमरे में क़ैद कर दिया था

नौशाद के ठुकराने के बाद प्रोड्यूसर्स ने संगीतकार सी रामचंद्र से बात की जिन्होंने एक महीने के अंदर “आज़ाद” फ़िल्म के 9 गाने बनाए, जो सभी पॉपुलर हुए। लेकिन इन्हें बनाना इतना भी आसान नहीं रहा, क्योंकि सारी बात तय हो जाने के बाद गीतकार राजेंद्र कृष्ण 3 गाने लिखकर ग़ायब हो गए। सी रामचंद्र बाक़ी गानों का इंतज़ार करते रहे लेकिन राजेंद्र कृष्ण को रेसकोर्स से फुर्सत ही नहीं थी। सी रामचंद्र बिना बोलों के धुन नहीं बनाते थे इसलिए धुनें भी तैयार नहीं हो पा रही थीं।

सी रामचंद्र

आख़िरकार जब डेडलाइन सर पर आ गई तो सी रामचंद्र ने राजेंद्र कृष्ण को एक मैसेज भेजा, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी के नाम से राजेंद्र कृष्ण को नाश्ते पर बुलाया। जब राजेंद्र कृष्ण घर पहुँचे तो सी रामचंद्र उन्हें एक कमरे में ले गए और बाहर से ताला लगाकर स्टूडियो चले गए। ये कहकर कि ये कमरा तभी खुलेगा जब राजेंद्र कृष्ण बाक़ी के गाने लिख देंगे और स्टूडियो में फ़ोन करके सी रामचंद्र को सुना देंगे। क्योंकि सिर्फ़ तीन दिन बचे थे और छह गाने बाक़ी थे। कमाल की बात ये है कि राजेंद्र कृष्ण ने अगले दो घंटों में ही वो छह गाने लिख डाले, जिन्हें अगले दो दिनों में सी रामचंद्र ने कंपोज़ करके रिकॉर्ड भी कर दिया।

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“आज़ाद” फ़िल्म का गाना “कितना हसीन है मौसम” लता मंगेशकर और चितलकर की आवाज़ में है, अगर ध्यान से न सुनें तो ऐसा लगता है जैसे तलत महमूद गा रहे हों। दरअस्ल ये गाना लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज़ में ही रिकॉर्ड होना था। लेकिन रिकॉर्डिंग के दिन तलत महमूद की तबियत ख़राब हो गई और वो आ नहीं सके। रिकॉर्डिंग री-शेड्यूल नहीं हो सकती थी, इसीलिए सी रामचंद्र ने ख़ुद माइक संभाला और अपनी आवाज़ में ये गाना रिकॉर्ड किया, लेकिन जब हम इसे सुनते हैं तो तलत महमूद वाला इफ़ेक्ट साफ़ सुनाई देता है।

सी रामचंद्र

सी रामचंद्र कई मायनों में पायनियर रहे, उन्होंने अपना एक अलग स्टाइल बनाया जो विविधताओं भरा है। जिसमें सिर्फ़ मस्ती भरे हलके-फुल्के गीत ही नहीं बल्कि शुद्ध शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत भी हैं, जो उतने ही पॉपुलर हैं जितने उनके कंपोज़ किये लाइट सांग्स। अपनी इसी ख़ासियत के कारण सी रामचंद्र और उनका संगीत हमारे दिलों में बसा है।