अनूप कुमार

अनूप कुमार की 100 वीं जयंती के मौक़े पर उनके करियर और फ़िल्मों पर एक नज़र।

अनूप कुमार : नाकाम गांगुली भाई

तीन भाई थे कुमुदलाल गंगोपाध्याय, कल्याण कुमार गंगोपाध्याय और आभास कुमार गंगोपाध्याय इनकी एक बहन थीं सती देवी जिनकी शादी हुई बॉम्बे में काम करने वाले शशधर मुखोपाध्याय से। शशधर मुखोपाध्याय ने अपने सबसे बड़े साले को बॉम्बे टॉकीज़ की लेबोरेटरी में काम पर लगा दिया और उनकी क़िस्मत ने कुछ ऐसा पलटा खाया कि वो बॉम्बे टॉकीज़ के हीरो बन गए और न सिर्फ़ अभिनय किया बल्कि अपने गाने भी गाए। ये मशहूर हुए अशोक कुमार के नाम से।

कृपया इन्हें भी पढ़ें – महमूद – बॉलीवुड का पहला “भाईजान”

आभास कुमार को गाने का शौक़ था तो वो भी गायक बनने के इरादे से अपने बड़े भाई के पास बॉम्बे चले गए। पर उन्हें गाने की बजाए अभिनय के मौक़े मिले जो उन्होंने ये सोच के ले लिए कि इसी बहाने गाने के मौक़े भी मिल जायेंगे और मिले भी। और वो मशहूर हुए प्लेबैक सिंगर और अभिनेता किशोर कुमार के नाम से।

अनूप कुमार

इन्हीं के भाई थे कल्याण कुमार जो तीनों भाइयों में इकलौते थे जिन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा ली थी, उन्होंने बनारस से संगीत विशारद किया था। यूडलिंग भी अनूप कुमार ने किशोर कुमार से पहले सीखी थी। किशोर कुमार अनूप कुमार से तो छोटे थे ही घर में भी सबसे छोटे थे इसी वजह से घरवालों का प्यार भी किशोर कुमार को सबसे ज़्यादा मिलता था, जो कभी-कभी अनूप कुमार को खटकता भी था। किशोर कुमार बॉर्न टैलेंटेड थे, बिना कुछ सीखे वो फैमिली फंक्शन्स में सबके सामने पूरे कॉन्फिडेंस के साथ बहुत अच्छा गाते थे, सब उनसे इम्प्रेस रहते थे।

कृपया इन्हें भी पढ़ें – ओम प्रकाश के किरदार हैं उनकी असली पहचान

ख़ुद को साबित करने के लिए, सबकी नज़रों में अपनी जगह बनाने के लिए अनूप कुमार ने बनारस जाकर संगीत विशारद किया ताकि छोटे भाई के साथ-साथ उनकी भी तारीफ़ें हों। योडलिंग भी उन्होंने ही सबसे पहले सीखी थी। वो कुछ वेस्टर्न रेकॉर्ड्स लाए थे और कमरा बंद करके उन्हें सुनकर यूडलिंग सीखा करते थे, लेकिन उन्हें पता नहीं था कि किशोर कुमार भी छुप-छुप कर वो यूडलिंग सुनते थे। इस तरह अनूप कुमार ने यूडलिंग भी सीख ली थी। पर कमाल की बात है कि फ़िल्मों में उनकी गायकी बहुत ज़्यादा सुनने में नहीं आती।  न ही एक अभिनेता के रूप में उनका करियर कुछ ख़ास कहा जा सकता है।

अनूप कुमार ने बतौर सोलो हीरो 5 फ़िल्में कीं

24 मार्च 1926 को खांडवा में अनूप कुमार का जन्म हुआ। 16 साल बड़े भाई और एक बड़ी बहन के बाद वो तीसरी संतान थे, किशोर कुमार उनसे छोटे थे। लेकिन फ़िल्मों में किशोर कुमार उनसे पहले आ गए थे। 1950 की बात है अनूप कुमार अपने हनीमून के लिए बॉम्बे में थे। उनके बड़े भाई की फ़िल्म बन रही थी “निशाना” जिसमें उनके डबल की ज़रूरत महसूस हुई तो अनूप कुमार को काम करने के लिए बुला लिया गया।

अनूप कुमार

वहीं सेट पर निर्देशक अमिय चक्रबर्ती ने उन्हें देखा और उन्हें एक फ़िल्म का ऑफर दे दिया। उन्होंने ही कल्याण कुमार गांगुली का नाम बदल कर अनूप कुमार रखा। वो फिल्म थी “गौना” जो 1950 में ही रिलीज़ हुई। इसके बाद अनूप कुमार भी फ़िल्मों का हिस्सा बन गए। बतौर सोलो हीरो अनूप कुमार ने गौना के अलावा रानी (52), फिरदौस (53), सजनी (56), किस्मत पलट के देख (61)  जैसी 5 फ़िल्में कीं।

हास्य उनके ख़ून में था

अनूप कुमार नायक की भूमिका के साथ-साथ मल्टीस्टारर फ़िल्मों में, सेकंड लीड में और साइड रोल्स में भी दिखाई देते रहे, ख़ासतौर पर अपने भाइयों के साथ। “चलती का नाम गाड़ी”, “देख कबीरा रोया”, “जंगली”, “चाचा ज़िंदाबाद”, “झुमरु” वो फ़िल्में हैं जो अनूप कुमार का नाम आते ही सबसे पहले याद आती हैं। इन फ़िल्मों में उन्होंने हास्य भूमिकाएँ कीं, आज भी अनूप कुमार का नाम आने पर एक हास्य कलाकार की छवि ही उभरती है फिर चाहे किरदार कोई भी हो।

अनूप कुमार

एक्चुअली कॉमेडी का कीड़ा तीनों ही भाइयों में था, और उनका ये गुण उन सभी फ़िल्मों में देखा जा सकता है, जिनमें तीनों ने एक साथ स्क्रीन शेयर की है। 1957 की बंदी, 1958 की चलती का नाम गाड़ी, और 1982 की चलती का नाम ज़िन्दगी। लेकिन इन तीनों भाइयों की सबसे मशहूर फ़िल्म है “चलती का नाम गाड़ी”। “चलती का नाम गाड़ी” के साथ-साथ किशोर कुमार ने “लोकोचुरी” के नाम से एक बांग्ला फिल्म बनाई थी, यही अनूप कुमार की इकलौती बांग्ला फ़िल्म रही।

कृपया इन्हें भी पढ़ें – भगवान दादा के जीवन के अनछुए पहलू

 

किशोर कुमार ने ये दोनों फ़िल्में इसलिए बनाई थीं कि फ़िल्में फ़्लॉप हो जाएँ तो उन्हें इनकम टैक्स नहीं देना पड़ेगा। लेकिन दोनों ही सुपरहिट रहीं और चलती का नाम गाड़ी तो आज भी बेहतरीन कॉमेडी मानी जाती है। इसमें तीनो गाँगुली भाइयों का कॉमिक टाइमिंग ज़बरदस्त है और उन्हें ये गुण अपने पिता कुंजलाल गांगुली से मिला था जो यूँ तो वक़ील थे मगर कोर्ट रूम में भी ऐसे-ऐसे पंच मारते थे कि सब हँस पड़ते थे।

अनूप कुमार

अनूप कुमार उन कलाकारों में से एक थे, जिनका नाम लेते ही एक सहज, और कॉमिक चेहरा सामने आता है—लेकिन उनके जीवन की कहानी सिर्फ हँसी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें कहीं न कहीं पीछे छूट जाने का दर्द भी शामिल है। क्योंकि शुरुआत से ही अनूप कुमार साइड रोल्स, और केरैक्टर रोल्स भी करने लगे थे और आख़िर तक उन्होंने फ़िल्मों में काम करना जारी रखा।

अनूप कुमार छोटे-छोटे दृश्यों में आख़िर तक नज़र आते रहे

“जब याद किसी की आती है”, “रात और दिन”, “प्रेम पुजारी”, “अमर प्रेम”, “विक्टोरिया नंबर 203”, “अनहोनी”, “मजबूर”, “चोरी मेरा काम” जैसी कई फ़िल्मों में आप उन्हें अभिनय करते देख सकते हैं। किसी-किसी फ़िल्म में तो उनका सिर्फ़ एक दृश्य है। उनकी आख़िरी फ़िल्म आई थी 1995 में “रॉक डांसर”। 1969 में अनूप कुमार ने ‘अनूप कुमार प्रोडक्शंस’ के बेनर तले एक फ़िल्म का निर्माण किया “आँसू बन गए फूल” लेकिन इसके बाद उन्होंने और किसी फ़िल्म का निर्माण नहीं किया।

अनूप कुमार

बहुत सालों बाद उन्होंने एक टीवी धारावाहिक बनाया “भीम-भवानी” जिसमें उन्होंने अपने बड़े भाई अशोक कुमार के साथ अभिनय भी किया। भीम भवानी के अलावा अनूप कुमार दादा दादी की कहानियाँ और एक राजा एक रानी जैसे टीवी धारावाहिकों में भी दिखाई दिए। अपने आख़िरी दिनों में अनूप कुमार काफ़ी बीमार थे और फिर 20 सितम्बर 1997 को कार्डियक अरेस्ट की वजह से उनका निधन हो गया।

कृपया इन्हें भी पढ़ें – असित सेन के बोलने के अंदाज़ ने उन्हें अलग पहचान दी

 

अनूप कुमार की पहचान एक कॉमेडियन और चरित्र कलाकार की थी। अगर तीनों गांगुली भाइयों की बात की जाए तो सबसे ज्यादा शोहरत अशोक कुमार और किशोर कुमार को मिली। अनूप कुमार को उतनी सफलता नहीं मिल पाई। वजह क़िस्मत ही कही जा सकती है क्योंकि टैलेंट तो उनमें भी था बस उन्हें अपने टैलेंट को दिखाने का मौक़ा नहीं मिला।

अनूप कुमार

या कहें कि दो मशहूर भाइयों के इंडस्ट्री में स्थापित होने का उन पर प्रेशर रहा हो ! अक्सर लोग उन तीनों की तुलना भी करते होंगे, जैसे आज हम कर रहे हैं, और ऐसी तुलना होना आम बात है। वो कहावत तो आपने भी सुनी होगी कि बड़े पेड़ों की छाया में छोटे पौधे पूरी तरह पनप नहीं पाते। अगर अनूप कुमार ने अपना अलग रास्ता चुना होता तो शायद वो कामयाब होते!