रवि वो संगीतकार थे जिनके गाने हमारी रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा हैं बचपन से लेकर शादी, त्यौहार और फिर जीवन की सच्चाई समझने तक। जो संगीत वो दे गए हैं वो सरल है, सिम्पल है लेकिन सदाबहार है।
3 मार्च 1926 को दिल्ली में जन्मे रवि शंकर शर्मा के पिता भजन गाया करते थे, उन्हें गाते देख सुनकर कर ही उनमें भी गायकी के प्रति रूचि पैदा हो गई। पहली बार उन्होंने मोहल्ले के एक कीर्तन में फ़िल्म पुकार का ये मशहूर फ़िल्मी भजन गाया था “तुम बिन हमरी कौन खबर ले” – पुकार (1939) – शीला – मीर साहब) जिसकी सबने तारीफ़ की।
रवि को बचपन से गायकी का शौक़ था और वो गायक बनना चाहते थे
रवि मैट्रिक के एग्जाम में फेल हो गए थे। उनके पिता ने उन्हें इलेक्ट्रीशियन का काम सिखाया। इसके बाद रवि ने पहले DCM इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में काम किया, फिर पोस्ट एंड टेलीग्राफ डिपार्टमेंट में, और फिर दिल्ली कैंटोनमेंट में। मगर गाने का शौक़ ऐसा था कि इसी दौर में उन्होंने आल इंडिया रेडियो पर भी गाना गाना शुरू कर दिया था। शायद आप न जानते हों पर उन्होंने फ़िल्मों में भी अपने गायकी के शौक़ को पूरा किया।
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रवि के गाए गीतों की सूची
- डाकू की लड़की (1954)
मैं भी डाकू, तू भी डाकू, दोनों चोर उचक्के – शमशाद बेगम के साथ - शेर दिल (1954)
ओ शेवरलेट के पिया – तलत महमूद के साथ
दिल का हाल बताता हूँ – मनोरमा के साथ - बाहु (1954)
दूर दूर से क्या गाता है दिल तू पास जो हमरे – बेला मुखर्जी के साथ - वचन (1955)
यूं ही छुपके-छुपके बहाने – आशा भोसले के साथ - अरब का सौदागर (1956)
इधर भी इक नज़र जो आपकी सरकार हो जाए – आशा भोसले के साथ - लालटेन (1956)
मैं मर गया तो लिखना मेरे फसाने में – तलत महमूद के साथ - यहूदी की लड़की (1957)
ऐ खुदा तेरे बंदों के दिल – हेमंत कुमार के साथ - उस्तादों के उस्ताद (1963)
तूफानों से टकराए जा – आशा भोसले के साथ - गौरी (1968)
गंगा भी बह रही है चिताओं के साथ-साथ – सोलो - एक फूल दो माली (1969)
किस्मत के खेल निराले मेरे भैया – सोलो - पड़ोसी (1971)
मेहनत कर ले बन्दे मेहनत का फल मिलेगा – सोलो
ऐ मेरी मजबूरियों – सोलो - उम्मीद (1971)
इंसान जी रहा है उम्मीद के सहारे – सोलो - धड़कन (1972)
ऐ प्यार सादियाँ एलपार – किशोर कुमार, और आशा भोसले के साथ - आदमी सड़क का (1977)
आज मेरे यार की शादी है (भाग-2) – मोहम्मद रफ़ी, और देवेन वर्मा के साथ - प्रेमिका (1977)
वस्ले-यार का इंतज़ार था, ना मैं सो सका – सोलो
रवि ने कभी संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली
1947 की बात है उन दिनों मोहम्मद रफ़ी “जश्न-ए-जम्हूरियत” में गाने के लिए दिल्ली आए थे। रवि उनसे मिलने फ़तेहपुरी के कोरोनेशन होटल पहुँच गए और उनके सामने गायक बनने की इच्छा ज़ाहिर कर दी। तब रफ़ी साहब ने उन्हें सलाह दी कि पहले म्यूज़िक और नोटेशन सीखें। लेकिन तब भी रवि ने क्लासिकल म्यूज़िक में कोई फॉर्मल ट्रैंनिंग नहीं ली बल्कि ख़ुद ही हारमोनियम और दूसरे क्लासिकल इंस्ट्रूमेंट्स बजाना सीखा।

शायद यही वजह है कि उनकी धुनों में एक तरह की सादगी है जो उनकी बनाए गानों को हरदिल अज़ीज़ बनाती हैं। उनके गीतों को सुने तो उनका संगीत गायक की आवाज़ को दबाता नहीं है बल्कि उभारता है। रवि ने मन में ठान चुके थे कि वो मुंबई जाकर अपना भाग्य आज़माएँगे हाँलाकि तब तक उनकी शादी हो चुकी थी और एक बेटी भी थी पर अपने पैशन को फॉलो करने के लिए वो 1950 में मुंबई चले आए। लेकिन जब आप की कोई जान-पहचान न हो तो मुश्किलों का सामना करना ही पड़ता है।
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कितनी दफा ऐसा होता कि रवि फुटपाथ पर, रेलवे प्लेटफॉर्म पर या किसी दुकान के बाहर सोते। काम की तलाश में मारे-मारे फिर रहे थे पर काम मिल नहीं रहा था तो उन्हें अपना हुनर याद आया और उन्होंने इलेक्ट्रीशियन का काम भी किया। कभी किसी का पंखा साफ़ कर दिया कभी कोई और छोटा मोटा काम जिससे खाने-पीने का इंतज़ाम हो जाता था।
हेमंत कुमार के साथ रवि के संगीत के सफ़र की शुरुआत हुई
बहुत कोशिशों के बाद भी जब रवि को सोलो गाने का मौक़ा नहीं मिला तो उन्होंने कोरस में गाना गाना शुरू किया। पहला गाना जो कोरस में गाया वो था नौजवान फ़िल्म का “झनक झनक झ न ना” और इसके लिए उन्हें 50 रुपए मिले थे। इसके बाद उन्होंने हेमंत कुमार के लिए आनंद मठ फ़िल्म के मशहूर गीत “वन्दे मातरम” के कोरस में अपनी आवाज़ दी। यहीं से उनका और हेमंत कुमार का साथ शुरू हो गया।
संगीतकार जिमी जिन्होंने फ़िल्मिस्तान और बॉम्बे टॉकीज़ में कई संगीतकारों को असिस्ट किया था, उन्होंने ही रवि को फ़िल्मिस्तान में तबलावादक के तौर पर हायर किया था और उन्होंने ही रवि को हेमंत कुमार से मिलवाया था। और हेमंत कुमार ने उन्हें अपना अस्सिस्टेंट बना लिया। इसकी एक वजह ये भी थी कि हेमंत कुमार बंगाली थे और उर्दू से ज़्यादा वाक़िफ़ नहीं थे और रवि की हिंदी और उर्दू बहुत अच्छी थी। बोल समझने में रवि उनकी काफ़ी मदद कर दिया करते थे।

1952 से 1957 तक, हेमंत कुमार के लिए रवि ने कई फ़िल्मों के ऑर्केस्ट्रेशन और रिकॉर्डिंग में मदद की, जिसमें शर्त, जागृति, चंपाकली और ब्लॉकबस्टर नागिन शामिल हैं। नागिन फ़िल्म की मशहूर बीन को बनाने में कल्याणजी और रवि दोनों सहायकों का कमाल था। कुछ स्टेबिलिटी आते ही रवि ने रहने के लिए एक गैराज किराए पर लिया और पत्नी और बेटी को भी मुंबई बुला लिया। इतने साल फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हुए रवि ने कुछ दोस्त तो बना ही लिए थे, ऐसे ही एक दोस्त थे देवेंद्र गोयल।
बतौर संगीतकार शुरुआत और फिर शोहरत का सफ़र
देवेंद्र गोयल ने उन्हें एक फ़िल्म ऑफर की जिसमें रवि ने बतौर इंडिपेंडेंट म्यूजिक डायरेक्टर संगीत दिया। सिर्फ़ संगीत ही नहीं दिया बल्कि दो गाने भी लिखे – “चंदा मामा दूर के” और “एक पैसा देदे बाबू” और आशा भोसले के साथ एक डुएट भी गाया – “यूँ ही चुपके चुपके बहाने बहाने”। ये फ़िल्म थी ‘वचन’ जिसका गाना “चंदा मामा दूर के” सबसे ज़्यादा मशहूर हुआ। वचन के बाद तो देवेंद्र गोयल की लगभग सभी फ़िल्मों में रवि ने ही म्यूजिक दिया।

देवेंद्र गोयल की वो फ़िल्में जिनमें रवि ने संगीत दिया
1957 – एक साल
1959 – चिराग़ कहाँ रौशनी कहाँ
1961 – प्यार का सागर
1964 – दूर की आवाज़
1966 – दस लाख
1969 – एक फूल दो माली
1972 – धड़कन
1975 – एक महल हो सपनों का
1977 – आदमी सड़क का

संगीतकार के तौर पर शुरु हुए इस सफ़र में भी मुश्किलें कम नहीं थीं। ‘वचन’ फ़िल्म हिट थी, उसके बाद आईं ‘एक साल’, ‘दिल्ली का ठग’, ‘घर-संसार’, ‘चिराग़ कहाँ रौशनी कहाँ’ जैसी फ़िल्मों में भी उनके कंपोज़ किये गाने मशहूर हुए। लगातार हिट गाने देने के बाद भी टॉप के संगीतकारों में अपना नाम लिखाने के लिए रवि को इंतज़ार करना पड़ा। और ये इंतज़ार ख़त्म हुआ जब 1960 में रिलीज़ हुई फ़िल्म चौदहवी का चाँद।
‘चौदहवी का चाँद’ टाइटल सांग के लिए जब रवि को सिचुएशन बताई गई तो उन्होंने फ़िल्म के टाइटल “चौदहवी का चाँद हो” को ही धुन में पिरोया लेकिन आगे की धुन के लिए बोल नहीं थे तो शकील बदायुनी को घर बुलाकर उन्होंने सिचुएशन बताई और शकील बदायुनी ने तुरंत जोड़ दिया “या आफ़ताब हो” और इस तरह इस गाने की धुन बन गई।
‘चौदहवीं का चाँद’ फिल्म से रवि बहुत मशहूर हो गए, इसी फ़िल्म ने साउथ इंडियन फ़िल्मकारों का ध्यान भी खींचा और फिर जैमिनी, S S वसन जैसे कई दक्षिण भारतीय बैनर्स की हिंदी फ़िल्मों में रवि ने म्यूजिक दिया।
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दक्षिण भारतीय बैनर्स की हिंदी फ़िल्में जिनमें रवि ने संगीत दिया
1960 – घूंघट
1961 – घराना
1961 – नज़राना
1961 – राखी
1963 – भरोसा
1963 – गृहस्थी
1965 – खानदान
1967 – औरत
1967 – मेहरबान
1968 – दो कलियां
1968 – गौरी
1970 – समाज को बदल डालो
रवि का संगीत, चोपड़ा कैंप की फ़िल्मों और साहिर की शायरी ने कई बेहतरीन गाने दिए
रवि को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के तौर पर जिन दो हिंदी फ़िल्मों के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड दिए गए दोनों ही दक्षिण भारतीय बेनर की फ़िल्में थीं पहली थी S S वासन की फ़िल्म “घराना” और दूसरी थी A भीमसिंह की ख़ानदान। हाँलाकि मेरा पर्सनल ओपिनियन ज़रा अलग है क्योंकि उन्होंने कई और फ़िल्मों में इन दोनों फ़िल्मों से बेहतर संगीत दिया है। ख़ासकर बी आर चोपड़ा की फ़िल्मों में, पर अवॉर्ड्स का क्या क्राइटीरिया होता है ये अवॉर्ड देने वाले ही जाने।

संगीतकार रवि की जब बात होती है तो सबसे पहले मुझे चोपड़ा कैंप के साथ उनका एसोसिएशन याद आता है, जिसने हमें गुमराह, वक़्त, हमराज़, आदमी और इंसान, निकाह, आज की आवाज़, तवायफ़ और दहलीज़ जैसी फिल्में दीं। जिनमें रवि के संगीत ने एक अलग ही माहौल क्रिएट किया।
चोपड़ा कैंप में उन्होंने साहिर लुधियानवी की शायरी को संगीत के सुरों में पिरोया और कमाल के गीत दिए। साहिर के साथ रवि बहुत सहज थे और उन्होंने आज और कल, काजल, आँखें, नीलकमल, दो कलियाँ, अमानत, और एक महल हो सपनों का के लिए भी उनकी कविताओं को खूबसूरत धुनों में बाँधा। रवि गीतकार को बाँधने में यक़ीन नहीं रखते थे बल्कि जब गीतकार गीत लिख लेता तो वो उसके बोलों पर धुन बनाते थे वो भी ऐसी जो मेलोडियस हो और जिसे आसानी से गुनगुनाया जा सके।

इसीलिए जब हम उनके गीतों पर नज़र डालते हैं तो ऐसे कितने ही गाने मिल जाते हैं जो हमारे बचपन का हिस्सा थे और आज भी हमारे साथ साथ रहते हैं। हर बच्चे ने “चंदा मामा दूर के” अपनी माँ के मुंह से सुना ही होगा। और ये गाने कभी न कभी गाये होंगे
- चल मेरे घोड़े
- बच्चे मन के सच्चे
शादी के माहौल में ये गीत सबसे पहले याद आते रहे हैं
- बाबुल की दुआएँ लेती
- मेरा यार बना
- आज मेरे यार
- डोली चढ़ के
अगर फ़िल्मी भजन पर ग़ौर करें तो क्या आप इन्हें भूले हैं
- जय रघुनन्दन जय सियाराम
- बड़ी देर भई नंदलाला
- सुन ले पुकार आई
- मेरी सुन ले अरज
- रोम रोम में बसने
भाई-बहन का प्यार हो या क़ुदरत से लगाव, हर मौक़े के लिए आपको गीत मिल जाएँगे। रोमांटिक गीतों की तो कोई कमी ही नहीं है।
मलयालम फ़िल्मों में वो बॉम्बे रवि के नाम से जाने जाते हैं
रवि के संगीत की ख़ासियत को दक्षिण भारतीय फ़िल्मकारों ने बहुत अच्छी तरह पहचाना और उन्हें मलयाली फ़िल्मों से बुलावा आया। जब वो पहली मलयाली फ़िल्म की टीम से काम समझने के लिए मिले, तो उन्हें मलयालम भाषा की कोई जानकारी नहीं थी। उन्हें मलयालम में लिरिक्स वाली कुछ शीट दी गईं, जिन्हें देवनागरी स्क्रिप्ट में ट्रांसलेट भी किया गया ताकि वह पढ़ सकें और समझ सकें।
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रवि को एक भी शब्द समझ नहीं आया फिर भी उन्होंने रात भर जागकर हर गाने के लिए ८-10 धुनें बना दीं। अगले दिन, उन्होंने वो धुनें प्रोडक्शन टीम को दे दीं। उनमें से कुछ बेस्ट धुनों को चुनकर पूरी कम्पोज़िशन तैयार की गईं। जब फिल्म रिलीज़ हुई, और गाने लोगों ने सुने, तो वो तुरंत हिट हो गए। वो पहली मलयाली फ़िल्म थी 1986 में आई पंचाग्नि। 1986 से 2005 तक रवि ने क़रीब 16 मलयालम फ़िल्मों में संगीत दिया, वहां वो बॉम्बे रवि के नाम से मशहूर हुए।

मलयालम फ़िल्मों में भी उन्होंने इतने यादगार गीत दिए हैं, जो युवाओं में आज भी लोकप्रिय हैं। मलयालम फ़िल्मों के लिए उन्हें 2 फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड, 3 बार स्टेट अवॉर्ड, और एक नेशनल अवॉर्ड दिया गया। मलयालम के अलावा उन्होंने एक तेलुगु और 2 पंजाबी फ़िल्मों में भी संगीत दिया। बतौर संगीतकार रवि ने 110 से ज़्यादा फ़िल्मों में 800 से ज़्यादा गाने बनाये। लेकिन उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत लिखे भी हैं, ये बात शायद आप न जानते हों।
रवि के लिखे गीतों की सूची
- अलबेली (1955)
गोरी तुझे आना पड़ेगा, खेंच लाएगी दिल की – हेमंत कुमार
तुम संग लागी बलम मोरी अंखियाँ – आशा भोसले
मुस्कुराती हुई चाँदनी – लता , हेमंत कुमार
जा जा रे चंदा तेरी चांदनी जलाए – लता मंगेशकर
हम तो पी के चले – हेमंत कुमार - बंदिश (1955)
तुम्हारी याद में ओ मेरे बलमा – लता मंगेशकर - अरब का सौदागर (1956)
हाय ये दुनिया मुसाफ़िरख़ाना, आज जानो तो – आशा भोसले
जीने का मज़ा है… मोहब्बत करके देख लो – आशा भोसले
ये महफ़िल सितारों की, रात ये बहारों की – आशा भोसले, हेमंत कुमार - हमारा वतन (1956)
प्यार का ज़माना है, ये समां सुहाना है – आशा भोसले
ये शौख सितारे, करते हैं इशारे – आशा भोसले, हेमंत कुमार - बंदी (1957)
काहे शरमाए गोरी, दिन ये सुहाना है – आशा भोसले - एक साल (1957)
उलझ गए दो नैना, देखो उलझ गए दो नैना – हेमंत कुमार, लता मंगेशकर - चिराग कहाँ रोशनी कहाँ (1959)
टिम टिम करते तारे, ये कहते हैं सारे – लता मंगेशकर - दस लाख (1966)
- गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा – आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी
- एक फूल दो माली (1969)
किस्मत के खेल निराले मेरे भैया – रवि
कर दे मदद गरीब की तेरा सुखी रहे संसार – आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी - पड़ोसी (1971)
मेहनत कर ले बन्दे मेहनत का फल मिलेगा – रवि - उम्मीद (1971)
इंसान जी रहा है उम्मीद के सहारे – रवि - धड़कन (1972)
मैं तो चला जिधर चले रास्ता – किशोर कुमार
तमन्नाओं की दुनिया यूँ तो – मोहम्मद रफ़ी
पी मेरी आँखों से, आ मेरी बाहों में – आशा भोसले - धुंध (1973)
जुबना से चुनरिया खिसक गई रे – आशा भोसले, मन्ना डे - घटना (1974)
मेरे देवता मैं तुम्हारी हो गई – लता मंगेशकर
पा पा पा पा… जिंदगी है जीने दो – जीत सिंह, कोरस
हज़ार बातें कहे ज़माना, मेरी वफ़ा पे – लता मंगेशकर - वंदना (1975)
ऐ सोचता है क्या आज, बड़ा मज़ा है – आशा भोसले - प्रेमिका (1977)
ये दुनिया है-2, कोई खोये कोई पाए – आशा भोसले
वस्ले-यार का इंतज़ार था – रवि
जीवन की जोत न बुझा हे शंकर – सुलक्षणा पंडित
जब जब तुझे देखूँ मेरा दिल ये बोले – मुकेश - साँझ की बेला (1980)
जीवन की सूनी राहों में – शारदा
पद्मश्री से सम्मानित संगीतकार रवि ने बेहद ख़ूबसूरत धुनें बनाई, बहुत से यादगार गीत हमें दिए, ऐसे गीत जो हर मौक़े, हर मौज़ुँ पर याद आते हैं, हँसाते भी हैं रुलाते भी हैं और हसीन वादियों में भी ले जाते हैं। अब जब हम संगीतकार रवि की 100वीं जयंती मना रहे हैं तो ये जानना और मानना बहुत ज़रुरी है कि चाहे उन्हें उस तरह का रिकग्निशन न मिला हो, जो मिलना चाहिए था, पर वो एक असाधारण संगीतकार थे, उनके बनाए गीत हमेशा हमेशा हमारे बीच गूँजते रहेंगे।