प्रेम धवन की शख़्सियत के बहुत से पहलू हैं, गीतकार, संगीतकार, नर्तक, नृत्य निर्देशक, गायक और अभिनेता भी। इस पोस्ट में उनकी शख़्सियत के सभी पहलुओं की चर्चा करेंगे।
प्रेम धवन एक ऐसे गीतकार जिनके लिखे गाने अक्सर हम गुनगुनाते हैं, खासतौर पर उनके देशभक्ति गीत। मगर ये बहुत दुखद है कि सालों-साल कई मौक़ों पर इन गीतों को सुनने, गुनगुनाने, पसंद करने के बावजूद ज़्यादातर लोग उन्हें लिखने वाले का नाम नहीं जानते। और जब नाम नहीं जानते तो ज़ाहिर है उनकी शख्सियत के बारे में कैसे जानेंगे। डांसर, डांस डायरेक्टर, म्युज़िक डायरेक्टर, जिन्होंने गायन भी किया और अभिनय भी मगर मुख्य रुप से प्रेम धवन एक गीतकार थे।
- ए मेरे प्यारे वतन
- छोडो कल की बातें
- तेरी दुनिया से होके मजबूर चला
- ऐ वतन ऐ वतन
- तेरी दुनिया से दूर
- आ लग जा गले दिलरुबा
- सब कुछ लुटा के होश
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प्रेम धवन के गीत सदाबहार हैं
प्रेम धवन का जन्म अम्बाला में हुआ लेकिन उनके पिता लाहौर जेल में वार्डन थे तो बचपन लाहौर की गलियों में गुज़रा। पिता वार्डन थे तो राजनितिक क़ैदियों से मुलाक़ातें होती रहती थी, इन्हीं मुलाक़ातों ने उनके युवा ज़हन में भी सामाजिक – राजनितिक प्रतिबद्धता जगाई। वो कॉलेज यूनियन का हिस्सा भी रहे, इसी दौर में उनके मन में स्वतंत्रता संग्राम के प्रति जूनून जागा, साथ ही लेखन भी शुरू हुआ। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन की और आज़ादी की लड़ाई में पूरी सक्रियता से भाग लिया, उस वक़्त उन्होंने बहुत से देशभक्ति गीत लिखे।
पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रेम धवन मुंबई चले गए। मुंबई में जब वो इप्टा के संपर्क में आए तो उन्हें एक ऐसा मंच मिल गया जहाँ वो गीत, नृत्य और लेखन के ज़रिए अपने क्रांतिकारी विचारों को खुलकर प्रकट कर सकते थे। इसी दौरान पं. रविशंकर से मुलाक़ात हुई और प्रेम धवन ने उनसे संगीत सीखना शुरू कर दिया। शांति रॉय वर्धन से उन्होंने नृत्य की शिक्षा ली। इस तरह वो लेखन के साथ साथ संगीत और नृत्य में भी पारंगत हो गए। उन्होंने जब फ़िल्मों में क़दम रखा तो सबसे पहले संगीतकार ख़ुर्शीद अनवर के सहायक के तौर पर काम किया।
बम्बई में कामयाबी
गीतकार के रूप में उनकी पहचान बनी बॉम्बे टॉकीज़ की 1948 में आई फ़िल्म ज़िद्दी से। बाद के दौर में आरज़ू(50), तराना(51), हमदर्द(53), वचन(55), एक साल(57), गेस्ट हाउस(59),सावन(59), हम हिंदुस्तानी(60), प्यार का सागर(61), ज़बक़(61), काबुलीवाला(61), दस लाख(66), एक फूल दो माली(69) जैसी कितनी ही फ़िल्मों में उन्होंने गीत लिखे।

1965 में आई मनोज कुमार की ‘शहीद’ वो पहली फ़िल्म थी जिसमें प्रेम धवन ने म्यूजिक दिया, इसका श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ मनोज कुमार को जाता है। जिन्होंने प्रेम धवन की म्यूज़िक की नॉलेज को देखते हुए फिल्म के निर्माता और अपने अच्छे दोस्त केवल कश्यप के आगे ये शर्त रखी थी कि इस फ़िल्म में म्यूजिक अगर कोई देगा तो वो प्रेम धवन होंगे। हाँलाकि प्रेम धवन ख़ुद उनके इस ऑफर पर चौंक गए थे और सोचने के लिए कुछ वक़्त भी माँगा था मगर मनोज कुमार ने उनसे भी साफ़-साफ़ कह दिया था कि अगर वो म्यूजिक देंगे तभी ये फ़िल्म बनेगी आख़िरकार प्रेम धवन को उनकी बात माननी पड़ी।
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‘पवित्र पापी’ में भी प्रेम धवन का संगीत था, जिसमें उन्होंने पंजाबी फोक का इस्तेमाल बहुत ही ख़ूबी से किया। उन्हें अलग-अलग राज्यों के लोक गीत-संगीत की गहरी समझ थी। मगर बतौर संगीतकार न तो उनकी ज़्यादा फ़िल्में आईं न ही उन्हें वो कामयाबी मिली जो बहैसियत गीतकार उन्होंने पाई।

डांस डायरेक्टर प्रेम धवन
‘नया दौर’ फ़िल्म का सुपरहिट, सदाबहार गाना है, “उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी”, इसके डांस स्टेप्स में जो अदाएं हैं उनकी दीवानगी आज भी बरक़रार है। इस गाने की कोरियोग्राफी प्रेम धवन की है। ‘दो बीघा ज़मीन’ का गाना “हरियाला सावन ढोल बजता आया ” इनके अलावा 1950 की फ़िल्म ‘आरज़ू’, फिर ‘धूल का फूल’, ‘गूँज उठी शहनाई’, और ‘वक़्त’ जैसी फ़िल्मों में भी उनका डांस डायरेक्शन दिखाई दिया।
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बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हुए भी प्रेम धवन का नाम अपने समय के दूसरे गीतकारों की तरह लाइमलाइट में नहीं रहा। इसकी वजह ये भी हो सकती है कि वो ख़ुद को दिखावों से दूर रखते थे। वो बड़े-बड़े बैनर्स या किसी ख़ास कैंप का हिस्सा नहीं बने और बाद में फ़िल्मी दुनिया से अलग हो गए। जब भी मौक़ा मिलता प्रेम धवन सीमा पर अपने फ़ौजी भाइयों से मिलने ज़रूर जाते। सुनील दत्त के साथ भी वो लद्दाख और नाथुला तक गए थे। 1970 में उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया था।
7 मई 2001 को वो ख़ामोशी से इस दुनिया से रुख़सत हो गए। प्रेम धवन ऐसे ही गीतकारों की सूची में आता है जिन्हें उनके वक़्त में वो मुक़ाम हासिल नहीं हुआ जिसके वो हक़दार थे। और फिर समय के साथ उनके नाम को भुला दिया गया।